भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २१९


व्योषाद्यचूर्ण ।

व्योषं वत्सकबीजं च निम्बंभूनिम्बमार्कवम् ।
चित्रकं रोहिणीं पाठां दार्वीमतिविषां समम् ॥
श्लक्ष्णचूर्णीकृतं सर्वं तत्तुल्या वत्सकत्वचः ॥ ३६ ॥
सर्वमेकत्र संयोज्य पिबेत्तण्डुलवारिणा ।
सक्षौद्रं वा लिहेदेतत्पाचनं ग्राहि भेषजम् ॥
तृष्णाऽरुचिप्रशमनं ज्वरातीसारनाशनम् ॥ ३७ ॥
प्रमेहं ग्रहणीदोषं गुल्मं प्लीहानमेव च ।
कामलां पाण्डुरोगं च श्वयथुं च विनाशयेत् ॥ ३८ ॥

सोंठ, पीपल, मिरच, इन्द्रजौ, नीमकी छाल, चिरायता, भाँगग, चीतेकी जड, कुटकी, पाठ, दारुहल्दी और अतीस इनको समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे और सब चूर्णकी बराबर भाग कुडेकी छालका चूर्ण लेकर सबको एकत्र मिलालेवे । इस चूर्णको तीन चार माशेकी मात्रासे चावलोंके जलके साथ पीनेसे या शहदके साथ चाटनेसे तृष्णा, अरुचि, ज्वरातिसार, प्रमेह, ग्रहणी, गुल्म, प्लीहा, कामला, पाण्डुरोग और सूजन आदिरोग नष्ट होते हैं । यह चूर्ण पाचक और ग्राह्य है ३६-३८

कलिंगादिगुटिका ।

कलिंगबिल्वनिम्बाम्रं कपित्थं सरसाञ्जनम् ।
लाक्षा हरिद्रे ह्रीबेरं कट्फलं शुकनासिकाम् ॥ ३९ ॥
लोध्रं मोचरसं शङ्खं धातकीं वटशुंगकम् ।
पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन वटकानक्षसम्मितान् ॥ ४० ॥
छायाशुष्कान् पिबेत् क्षिप्रं ज्वरातीसारशान्तये ।
रक्तप्रसाधना ह्येते शूलातीसारनाशनाः ॥ ४१ ॥

इन्द्रजौ, बेलगिरी, नीमकी छाल, आमकी गुठलीकी मींग, कैथके पत्ते, रसौंत, लाख, हल्दी, दारुहल्दी, सुगन्धवाला, कायफल, अरलूकी छाल, लोध, मोचरस, शंखभस्म, धायके फूल, बडके अंकुर इन सबको समान भाग लेकर चावलोंके जलके साथ पीसकर दो तोलेकी गोलियाँ बनाकर छायामें सुखालेवे । इनके सेवनसे ज्वरातिसार, रक्तातिसार, शूलसंयुक्त अतीसार नष्ट होजाता है ॥ ३९-४१ ॥