भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२२०भैषज्यरत्नावली ।[ ज्वरातिसार-

कुटजावलेह ।

कुटजत्वक् पलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण शर्कराप्रस्थकं पचेत् ॥ ४२ ॥
ततो लेहे घनीभूते चूर्णानीमानि दापयेत् ।
लवंगं जीरकं मुस्तं धातकी बिल्ववालकम् ॥ ४३ ॥
एला पाठा त्वचं शृंगी जातीफलमधूरिका ।
शक्रकाऽतिविषा क्षारं काकोली च रसाञ्जनम् ॥ ४४ ॥
शाल्मली वेष्टकं यष्टी समंगा रक्तचन्दनम् ।
वटशुंगं खादिरं च जम्ब्वाम्रपल्लवं तथा ॥ ४५ ॥
एषामक्षसमं चूर्णं प्रक्षिपेत् पाकविद् भिषक् ।
सिद्धेऽवतारिते शीते मधुनः कुडवं न्यसेत् ॥ ४६ ॥

कुडेकी जडकी छाल सौ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। जब पककर वह चौथाई भाग शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर इस क्वाथमें ६४ तोले मिश्री या शुद्धचीनी मिलाकर पकावे। पककर जब पाक अवलेहकी समान गाढा होजाय तब उसमें लौंग, जीरा, नागरमोथा, धायके फूल, बेलकी गिरी, सुगन्धवाला छोटी इलायची, पाठ, दालचीनी, काकडासिंगी, जायफल, सौंफ, इन्द्रजौ, अतीस, जवाखार, काकोली, रसौंत, मोचरस, मुलहठी, मंजीठ, लालचन्दन, वडके अंकुर, खैर, जामुन और आमके पत्ते इन औषधियोंके दो दो तोले परिमाण बारीक चूर्णको डालदेवे। जब उत्तम प्रकारसे पाक सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें ६४ तोले शहद मिलादेवे ॥ ४२-४६ ॥

खादयेत्कर्षमात्रं तु चानुपानविधिं शृणु ।
अनुपानं प्रदातव्यं दधिमस्तु त्वजापयः ॥ ४७ ॥
चांपेयकदलीमूलस्वरसं कर्षमानतः ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय संग्रहग्रहणीं जयेत् ॥ ४८ ॥
रोगं रक्तातिसारं च चिरकालसमुद्भवम् ।
पक्कापक्रमतीसारं नानावर्णं सवेदनम् ॥
शोथातीसारसहितं ज्वरमाशु व्यपोहति ॥ ४९ ॥