भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२३

सिंगरफ, मिरच, शुद्ध गन्धक, पीपल, सुहागा, शुद्ध मीठा तेलिया और धतूरेके बीज इन सबको समान भाग लेकर भाँगके रसमें एक प्रहरतक खरल कर चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । यह कनकसुन्दररस सेवन करतेही संग्रहणी, मन्दाग्नि, ज्वर और प्रबल अतीसारको नष्ट करता है । इसपर दही भात अथवा मट्ठे और भातका पथ्य देना चाहिये ॥ ६०-६२ ॥

बृहत्कनकसुन्दररस ।

शुद्धं सूतं समं गन्धं मरिचं टङ्कणं तथा ।
स्वर्णबीजं समं मर्द्यं भार्ङ्गीद्रवैर्दिनार्द्धकम् ॥ ६३ ॥
सूततुल्यं मृतं चाभ्रं रसः कनकसुन्दरः ।
अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति पित्तातीसारमुग्रकम् ॥ ६४ ॥

शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, मिरच, सुहागेकी खील और धतूरेके बीज सबको समान भाग लेकर भारंगीके रसमें दो प्रहरतक खरल करे फिर उसमें पारेके बराबरभाग अभ्रकभस्म मिलादेवे तो बृहत्कनकसुन्दररस सिद्ध होता है । इसको दो दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करनेसे अत्युग्र पित्तातिसार दूर होता है ॥ ६३॥६४ ॥

गगनसुन्दररस ।

टङ्कण दरदं गन्धमभ्रकं च समं समम् ।
दुग्धिकाय्रा रसेनैव भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ ६५ ॥
द्विगुञ्जं मधुना देयं श्वेतसर्जस्य वल्लकम् ।
विविधं नाशयेद्रक्तं ज्वरातीसारमुल्बणम् ॥ ६६ ॥
पथ्यं तक्रं पयश्छागमामशूलं विनाशयेत् ।
अग्निवृद्धिकरो ह्येष रसो गगनसुन्दरः ॥ ६७ ॥

सुहागा, सिंगरफ, गन्धक और अभ्रक इन प्रत्येकको समान भाग लेकर दुद्धीके रसमें ३ दिनतक भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली सफेद रालके दो रत्ती प्रमाण चूर्ण और शहदके साथ सेवन करनेसे विविध-प्रकारका रक्तविकार, ज्वर, अत्युग्र अतिसार और आमशूल नष्ट होता है और यह गगनसुन्दर रस विशेषकर जठराग्निकी वृद्धि करता है । इसपर मट्ठा और बकरीका दूध पथ्य है ॥ ६५-६७ ॥

कनकप्रभावटी ।

सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टङ्कणकं विषं च ।
गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां विदध्यात् ॥