भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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२२४ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-

घोरातिसारग्रहणीज्वराग्निमान्द्यं निहन्यात्कनकप्रमेयम् ।
दध्योदनं पथ्यमनुष्णवारि मांसं भजेत्तित्तिरिलावकानाम् ॥
धतूरेके बीज, मिरच, हंसपदी ( हंसराज ), पीपल, सुहागा, शुद्ध मीठा तेलिया और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर भाँगके रस वा क्वाथमें एक दिन-तक खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह कनकप्रभा वटी सेवन करतेही प्रबल अतिसार, ग्रहणी, ज्वर और अग्निमान्द्य आदि रोगोंको नष्ट करती है । इसपर दही भातका पथ्य, शीतलजल एवं तीतर और लवा पक्षीका मांसरस सेवन करना चाहिये ॥ ६८ ॥ ६९ ॥

मृतसंजीवनी वटी ।

मागधी वत्सनाभं च तयोस्तुल्यं च हिङ्गुलम् ।
मृतसंजीवनी ख्याता जम्बीररसमर्दिता ॥ ७० ॥
मूलकस्य च बीजानां वटिका तुल्यरूपिणी ।
पानीया शीततोयेन ज्वरातीसारनाशिनी ॥
विषूच्यां सन्निपाते च ज्वरे चैवातिदुस्तरे ॥ ७१ ॥
पीपल १ भाग, शुद्ध वत्सनाभ १ भाग और सिंगरफ २ भाग इनको एकत्र जम्बीरीनींबूके रसमें उत्तम प्रकारसे खरलकर मूलीके बीजकी बराबर गोलियाँ बना-लेवे । एकएक गोली शीतजलके साथ सेवन करनेसे ज्वर और अतिसार ( दस्त ) शीघ्र दूर होते हैं । विषूचिका और अतिदारुण सन्निपातज्वरमें यह मृतसंजीवनी नामक वटी अतीव हितकारी है ॥ ७० ॥ ७१ ॥

आनन्दभैरव रस ।

हिङ्गुलं च विषं व्योषं टङ्कणं गन्धकं समम् ।
जम्बीररससंयुक्तं मर्दयेद्यामकद्वयम् ॥ ७२ ॥
कासश्वासातिसारेषु ग्रहण्यां सन्निपातिके ।
अपस्मारेऽनिले मेहेऽप्यजीर्णे वह्निमान्द्यके ॥
गुञ्जामात्रा प्रदातव्यो रस आनन्दभैरवः ॥ ७३ ॥
सिंगरफ, शुद्ध मीठातेलिया, त्रिकुटा, सुहागा और शुद्धगन्धक सबको सम भाग लेकर एकत्र कूटपीसकर जम्बीरीनींबूके रसमें दो प्रहरतक खरल करे फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह आनन्दभैरवरस सेवन करतेही खाँसी, श्वास, अति-सार, संग्रहणी, सन्निपातज्वर, अपस्मार, वातविकार, प्रमेह, अजीर्ण और मन्दाग्नि इन रोगोंको दूर करताहै ॥ ७२ ॥ ७३ ॥