भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ]भाषाटीकासहिता ।२२९

कलायपरिमाणां तु खादेत्तां तु प्रयत्नतः ।
दृष्ट्वा वयश्चाग्निबलं यथाव्याध्यनुपानतः ॥ १०० ॥
हन्ति कासं क्षयं श्वासं वातश्लेष्मभवं ज्वरम् ।
परं वाजीकरः श्रेष्ठो बलवर्णाभिवर्द्धकः ॥ १०१ ॥
ज्वरे चैवातिसारे च सिद्ध एष प्रयोगराट् ।
नातः परतरः श्रेष्ठो विद्यतेऽभ्ररसायनात् ॥ १०२ ॥
भोजने शयने पाने नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ।
दधि चावश्यकं भक्ष्यं प्राह नागार्जुनो मुनिः ॥ १०३ ॥

यह रस रोगीकी अवस्था और अग्निके बलाबलको विचारकर यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन कराना चाहिये। इससे खाँसी, क्षय श्वास और वात-कफजन्य ज्वर शीघ्र नष्ट होते हैं। यह अन्यन्त वाजीकरण एवं बल, वर्ण और जठराग्निकी विशेषरूपसे वृद्धि करता है। ज्वर और अतिसाररोगमें तो यह सिद्धफलप्रद औषधि है। अभ्ररसायनोंमें इससे बढ़कर अन्य उत्तम औषध नहीं है। भोजन, पान और शयनादिमें कुछ परहेज नहीं है। किन्तु इसपर दही अवश्य खाना चाहिये ऐसा नागार्जुनमुनिने कहा है ॥ १००–१०३ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां ज्वरातिसारचिकित्सा ।

अथ अतिसार-चिकित्सा ।

आमपक्वक्रमं हित्वा नातिसारे क्रिया यतः ।
अतः सर्वातिसारेषु ज्ञेयं पक्कामलक्षणम् ॥ १ ॥

आम और पक्वके क्रमको त्यागकर अतिसारमें अन्य क्रिया ही नहीं है। इस कारण सम्पूर्ण अतिसारोंमें प्रथम आम और पक्वका निश्चय करना चाहिये ॥ १ ॥

आम और पक्वके लक्षण ।

मज्जत्यामा गुरुत्वाद्विट् पक्वा तूत्प्लवते जले ।
विनाऽतिद्रवसंघातशैत्यश्लेष्मप्रदूषणात् ॥ २ ॥

अपक्व मल भारी होनेके कारण जलमें डूब जाता है और पक्व मल जलमें तैरत रहता है। किन्तु अतिद्रव (बहुत पतला) अपक्व मल भी जलके ऊपर तैरता है एवं कठिन, श्वेतवर्ण, शितल और दुष्ट कफसे दूषित पक्व मल जलमें डूब जाता है ॥ २ ॥