भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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आम और पक्वके अन्य लक्षण ।
शकृद् दुर्गन्धि साटोपविष्टम्भार्तिप्रसेकिनः ।
विपरीतं निरामं तु कफात् पक्वं च मज्जति ॥ ३ ॥
आमातिसारमें मल दुर्गन्धियुक्त उदरमें अफारेसहित गुड़गुड़शब्द होना' पीड़ाके साथ थोड़ा थोड़ा मलका उतरना और मुखमेंसे पानीका निकलना इत्यादि लक्षण होतेहैं । एवं आमरहित पक्वातिसारमें इन सब लक्षणोंके विपरीत लक्षण होतेहैं और कफके कारण भारी होनेसे पक्व मल जलमें डूब जाताहै ॥ ३ ॥
आम और पक्वातिसारकी चिकित्सा ।
न तु संग्रहणं दद्यात् पूर्वमामातिसारिणे ।
दोषा ह्यादौ रुद्ध्यमाना जनयन्त्यामयान् बहून् ॥ ४ ॥
शोथपाण्ड्वामयप्लीहकुष्ठगुल्मोदरज्वरान् ।
दण्डकालसकाध्मानग्रहण्यर्शोगदांस्तथा ॥ ५ ॥
क्षीणधातुबलार्तस्य बहुदोषोऽतिनिःसृतः ।
आमोऽपि स्तम्भनीयः स्यात्पाचनान्मरणं भवेत् ॥ ६ ॥
आमातिसारवाले रोगीको पहिले एकदम मलको रोकनेवाली औषधि कभी नहीं देनी चाहिये । कारण, प्रथमही अर्थात् अपक्व अवस्थामें मलको रोक देनेसे सब दोष एकत्रित होकर बँधजाते हैं और वे शोथ, पाण्डु, प्लीहा, कोढ, गुल्म, उदर, ज्वर, दण्डक, अलसक, अफारा, संग्रहणी और बवासीर आदि रोगोंको उत्पन्न करदेते हैं। किन्तु जो रोगी अधिक मलस्राव होनेसे धातुक्षीण और बलहीन हो और अनेक दोषोंसे युक्त हो ऐसे रोगीको आमकी अवस्थामें भी मलावरोधक औषधियाँ देनी चाहिये । कारण-ऐसे रोगीको पाचक औषधि देनेसे रोगीकी मृत्यु हो सकती है ॥ ४-६ ॥
आमातिसार-चिकित्सा
आमे विलङ्घनं शस्तमादौ पचनमेव वा ।
कार्यं चानशनस्यान्ते प्रद्रवं लघु भोजनम् ॥ ७ ॥
आमावस्थामें प्रथम लंघन कराने चाहिये । फिर पाचक औषधियाँ देनी चाहिये। एवं लंघन होचुकनेपर पेयादि पतले और हल्के पदार्थ पथ्यरूपसे भोजनके लिये देने चाहिये ॥ ७ ॥