भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३३


धान्यपञ्चक और धान्यचतुष्क ।

धान्यकं नागरं मुस्तं बालकं बिल्वमेव च ।
आमशूलविबन्धघ्नं पाचनं वह्निदीपनम् ॥
इदं धान्यचतुष्कं स्यात् पैत्ते शुण्ठीं विना पुनः ॥ १९ ॥

धनियाँ, सोंठ, नागरमोथा, सुगन्धवाला और बेलगिरी इनका क्वाथ पान करनेसे आमशूल और विबन्ध नष्ट होता है । यह क्वाथ पाचक और अग्निको दीपन करनेवाला है, इसको धान्यपंचक क्वाथ कहते हैं । किन्तु पित्तातिसारमें इस धान्यपंचकमेंसे सोंठको निकालकर शेष चारों औषधियोंका क्वाथ बनाकर देना चाहिये । इसको धान्यचतुष्क कहते हैं ॥ १९ ॥

स्वल्प शालपर्ण्यादि ।

शालपर्णीबलाबिल्वैः पृश्निपर्ण्या च साधिता ।
दाडिमाम्ला हिता पेया पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ २० ॥

शालपर्णी, खिरेंटी, बेलगिरी और पृश्निपर्णी इनके द्वारा सिद्ध की हुई पेया दाडिमिका रस मिलाकर पित्तकफातिसारवाले रोगीको पिलानी चाहिये ॥ २० ॥

बृहच्छालपर्ण्यादि ।

शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका ।
बलाश्वदंष्ट्राबिल्वानि पाठानागरधान्यकम् ॥
एतदाहारसंयोगे हितं सर्वातिसारिणाम् ॥ २१ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बडीकटेरी, कटेरी, खिरेँटी, गोखरू, बेलगिरी, पाठ, सोंठ और धनियाँ इन सब औषधियोंके द्वारा बनायी हुई पेया सब प्रकारके अतिसाररोगमें हितकारी है ॥ २१ ॥

वत्सकादि ।

वत्सकातिविषाशुण्ठीबिल्वहिङ्गुयवाम्बुदैः ।
चित्रकेण युतैः क्वाथ आमातीसारनाशनः ॥ २२ ॥

इन्द्रजौ, अतीस, सोंठ, बेलगिरी, हींग, जौ, नागरमोथा और लाल चीता इनका क्वाथ आमातिसारको नष्ट करता है ॥ २२ ॥

पथ्यादि ।

पथ्यादारुवचामुस्तनागरातिविषायुतैः ।
आमातीसारनाशार्थे क्वाथमेतत् पिबेन्नरः ॥ २३ ॥

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