भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३४ भैषज्यरत्नावली । [अतिसार-
आमवातिसारको शमन करनेके लिये रोगी हरड, देवदारु, वच, नागरमोथा सोंठ और अतीस इनका बनाया हुआ काथ पान करे ॥ २३ ॥
यमान्यादि ।
यमानीनागरोशीरधनिकातिविषाघनैः ।
बालबिल्वद्विपर्णीभिर्दीपनं पाचनं भवेत् ॥ २४ ॥
अजवायन, सोंठ, खस, धनियां, अतीस, नागरमोथा, कच्चे बेलकी गिरी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी इनका क्वाथ सेवन करनेसे अग्निदीपन और आम परिपक्व होती है ॥ २४ ॥
कलिङ्गादि ।
कलिङ्गऽतिविषा हिङ्गु पथ्या सौवर्चलं वचा ।
शूलस्तम्भविवन्धघ्नं पेयं दीपनपाचनम् ॥ २५ ॥
इन्द्रजौ, अतीस, हींग, हरड, कालानमक और बच इनका बनाया हुआ क्वाथ शूल, स्तम्भ और विबन्धको नष्ट करता है । तथा दीपन और पाचन है ॥ २५ ॥
कञ्चटादि ।
कञ्चटदाडिमजम्बूशृङ्गाटकपत्रह्रीबेरम् ।
जलधरनागरसहितं गङ्गामपिवेगिनीं रुन्ध्यात् ॥ २६ ॥
जल चौलाईके पत्ते, अनारके पत्ते, जामुनके पत्ते, सिंघाडेके पत्ते, सुगन्धवाला, नागरमोथा और सोंठ इनका क्वाथ गंगाके समान वेगवाले अतिसारको भी रोक देता है ॥ २६ ॥
कुटजादि ।
कुटजं दाडिमं मुस्तं धातकी बिल्वबालकम् ।
लोध्रचन्दनपाठाश्च कषायं मधुना पिबेत् ॥ २७ ॥
सामे शूले च रक्ते च पिच्छास्रावे च शस्यते ।
कुटजादिरिति ख्यातः सर्वातीसारनाशनः ॥ २८ ॥
कुडेकी छाल, अनारका बक्कल, नागरमोथा, धायके फूल, बेलगिरी, सुगन्धवाला, लोध, लालचन्दन और पाठ इनके मन्दोष्ण क्वाथको शहद मिलाकर पान करनेसे आम, शूल, रक्तस्राव और मलकी पिच्छिलता दूर होती है । यह कुटजादिनामसे प्रसिद्ध प्रयोग सर्वप्रकारके अतिसाररोगको नष्ट करता है ॥ २७ ॥ २८ ॥