भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२३६भैषज्यरत्नावली ।[ अतिसार-

पथ्यादि ।

पथ्या दारु वचा शुण्ठी मुस्ता चातिविषा लता ।
क्वाथ एषां हरेत् पीतो वातातीसारमुल्बणम् ॥ ३४ ॥
हरड, देवदारु, वच, सोंठ, नागरमोथा, अतीस और गिलोय इनके क्वाथको पान करनेसे प्रबल वातातीसार नष्ट होता है ॥ ३४ ॥

वचादि ।

वचा चातिविषा मुस्तं बीजानि कुटजस्य च ।
श्रेष्ठः कषाय एतेषां वातातीसारशान्तये ॥ ३५ ॥
वच, अतीस, नागरमोथा और इन्द्रजौ इनका क्वाथ वातातिसारको शमन करनेके लिये देना चाहिये ॥ ३५ ॥

पित्तातीसार-चिकित्सा ।

मधुकादि ।

मधुकं कट्फलं लोध्रं दाडिमस्य फलत्वचौ ।
पित्तातिसारे मध्वक्तं पाययेत् तण्डुलाम्बुना ॥ ३६ ॥
पित्तज अतिसारमें मुलहठी, कायफल, लोध, अनारका कच्चा फल और बकल इनके समान भाग चूर्णको चावलोंके पानी और मधुके साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये ॥ ३६ ॥

बिल्वादि ।

बिल्वशक्रयवाम्भोदबालकातिविषाकृतः ।
कषायो हन्त्यतीसारं सामं पित्तसमुद्भवम् ॥ ३७ ॥
बेलकी गिरी, इन्द्रजौ, नागरमोथा, सुगन्धवाला और अतीस इनका बना हुआ क्वाथ पान करनेसे पित्तसे उत्पन्न हुआ आमातिसार नष्ट होता है ॥ ३७ ॥

कट्फलादि ।

कट्फलातिविषाम्भोदवत्सकं नागरान्वितम् ।
शृतं पित्तातिसारघ्नं दातव्यं मधुसंयुतम् ॥ ३८ ॥
कायफल, अतीस, नागरमोथा, इन्द्रजौ और सोंठ इनका क्वाथ बनाकर मधुके साथ पान करनेसे पित्तातीसार दूर होता है ॥ ३८ ॥

किराततिक्तादि ।

किराततिक्तकं मुस्तं वत्सकं सरसाञ्जनम् ।
पित्तातीसाररोगघ्नं सक्षौद्रं वेदनापहम् ॥ ३९ ॥

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