भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३७
चिरायता, नागरमोथा, इन्द्रजौ और रसौंत इनके क्वाथमें शहद मिलाकर सेवन करनेसे पीडासहित पित्तातिसार शमन होता है ॥ ३९ ॥
अतिविषादि ।
सक्षौद्राऽतिविषां पिष्ट्वा वत्सकस्य फलं त्वचम् ।
तण्डुलोदकसंयुक्तं पेयं पित्तातिसारनुत् ॥ ४० ॥
अतीस, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको चावलोंके जल और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे पित्तातिसार नष्ट होताहै ॥ ४० ॥
श्लेष्मातीसार-चिकित्सा ।
पथ्यादि ।
पथ्याग्निकटुकापाठावचामुस्तकवत्सकैः ।
सनागरैर्जयेत्क्वाथः कल्को वा श्लैष्मिकीं स्रुतिम् ॥ ४१ ॥
हरड, चीता, कुटकी, पाठ, वच, नागरमोथा, इन्द्रजौ, और सोंठ इनका क्वाथ अथवा कल्क कफके अतीसारको जीतता है ॥ ४१ ॥
चव्यादि ।
चव्यं सातिविषं मुस्तं बालबिल्वं सनागरम् ।
वत्सकत्वक्फलं पथ्या छर्दिश्लेष्मातिसारनुत् ॥ ४२ ॥
चव्य, अतीस, नागरमोथा, कच्चे बेलकी गिरी, सोंठ, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ और हरड, इनका क्वाथ पान करनेसे वमन और कफजनित अतिसार दूर होताहै ॥ ४२ ॥
पाठादिचूर्ण ।
पाठा वचा त्रिकटुकं कुष्ठं कटुकरोहिणी ।
उष्णाम्बुना विनिघ्नन्ति श्लेष्मातीसारमुल्बणम् ॥ ४३ ॥
पाठ, वच, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, कूठ और कुटकी इनका चूर्ण उष्ण जलके साथ पान करनेसे भयंकर कफातिसार दूर होताहै ॥ ४३ ॥
हिंग्वादिचूर्ण ।
हिङ्गु सौवर्चलं व्योषमभयाऽतिविषा वचा ।
पीतमुष्णाम्बुना चूर्णं श्लेष्मातीसारनाशनम् ॥ ४४ ॥
हींग, कालानमक, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, अतीस और वच इनके चूर्णको गरम जलके साथ पान करनेसे कफातिसार नष्ट होताहै ॥ ४४ ॥