भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ भैषज्यरत्नावली । [ अतिसार-
पथ्यादिचूर्ण ।
पथ्या पाठा वचा कुष्ठं चित्रकं कटुरोहिणी । चूर्णमुष्णाम्बुना पीतं श्लेष्मातीसारनाशनम् ॥ ४५ ॥
हरड, पाठ, वच, कूठ, चीता और कुटकी इन प्रत्येकके समान भाग चूर्णको गरम जलके साथ पान करनेसे कफज अतिसार नष्ट होताहै ॥ ४५ ॥
द्वन्द्वजातीसार-चिकित्सा ।
द्विदोषलक्षणैर्विद्यादतीसारं द्विदोषजम् । तेषां चिकित्सा प्रोक्तैव विशिष्टा च निगद्यते ॥ ४६ ॥
जिस अतिसारमें दो दोषोंके मिलेहुए लक्षण होते हैं उसको द्विदोषज अतिसार कहते हैं । उनकी स्वतन्त्ररूपसे चिकित्सा पहिले लिखी जाचुकी है । अब यहाँ द्विदोषज अतिसारकी विशेषरूपसे चिकित्सा लिखीजाती है ॥ ४६ ॥
वातपित्तातिसार-चिकित्सा ।
कालिङ्गादि ।
कलिङ्गकवचामुस्तं दारु सातिविषं समम् । कल्कं तण्डुलतोयेन पिबेत पित्तानिलामयी ॥ ४७ ॥
वात और पित्तके अतिसारवाले रोगीको इन्द्रजौ, वच, नागरमोथा, देवदारु और अतीस इन सबको समान भाग लेकर चावलोंके जलके साथ पीस कर कल्क बनाकर पान करना चाहिये ॥ ४७ ॥
पित्तश्लेष्मातिसार-चिकित्सा ।
मुस्तादि ।
मुस्ता सातिविषासूर्वा वचा च कुटजः समः । एषां कषायः सक्षौद्रः पित्तश्लेष्मातिसारहृत् ॥ ४८ ॥
नागरमोथा, अतीस, मूर्वा, वच और कुडेकी छाल इनको समान भाग लेकर और यथाविधिसे क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पान करनेसे पित्त और कफातीसार दूर होताहै ॥ ४८ ॥
समङ्गादि ।
समङ्गा धातकी बिल्वमास्रास्थ्यम्भोजकेशरम् । बिल्वं मोचरसं लोध्रं कुटजस्य फलत्वचौ ॥ ४९ ॥ पिबेत्तण्डुलतोयेन कषायं कल्कमेव वा । श्लेष्मपित्तातिसारघ्नं रक्तं वाथ नियच्छति ॥ ५० ॥