भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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२४० | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार-


पञ्चमूली-बलादि ।

पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ।
पाठाभूनिम्बबर्हिष्ठकुटजत्वक्फलैः शृतम् ॥ ५५ ॥
सर्वजं हन्त्यतीसारं ज्वरं चापि तथा वमिम् ।
सशूलोपद्रवं श्वासं कासं चापि सुदुस्तरम् ॥ ५६ ॥

पञ्चमूल (पित्ताधिक्यमें स्वल्प पंचमूल और वात-कफाधिक्यमें बृहत्पंचमूल लेना चाहिये), खिरैंटी, बेलगिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, पाठ, चिरायता, सुगन्ध-वाला, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनका क्वाथ शीतल करके पान करनेसे त्रिदोषज अतिसार, ज्वर, वमन, शूल आदि उपद्रवोंसहित दुस्तर श्वास और कास-विकार दूर होते हैं ॥ ५६ ॥

पुटपक्वौषधप्रयोगविधि ।

अवेदनं सुसंपक्वं दीप्ताग्नेः सुचिरोत्थितम् ।
नानावर्णमतीसारं पुटपाकैरूपाचरेत् ॥ ५७ ॥

यदि प्रदीप्ताग्निवाले रोगीके बहुत दिनोंका पुराना, पीडारहित, परिपक्व और अनेक वर्णका अतिसार (रोग) हो तो उसकी अतिसाररोगमें कहीहुई पुटपाककी औषधियोंसे चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥

कुटज-पुटपाक ।

स्निग्धं घनं कुटजवल्कलजन्तवजग्ध-
मादाय तत्क्षणमतीव च कुट्टयित्वा ।
जम्बूपलाशपुटतण्डुलतोयसिक्तं
बद्धं कुशेन च बहिर्घनपङ्कलिप्तम् ॥ ५८ ॥
सुस्विन्नमेतदवपीड्य रस गृहीत्वा
क्षौद्रेण युक्तमतिसारवते प्रदद्यात् ।
कृष्णात्रिपुत्रमतिपूजित एष योगः
सर्वातिसारहरणे स्वयमेव राजा ॥ ५९ ॥


१ "स्वरसस्य गुरुत्वेन पुटपाकं पलं पिबेत् । पुटपाकस्य पाकोऽयं बहिराङ्गारवर्णता ॥"
पुटपाककी विधि यह है कि-जब पुटपाकका बाहरसे लालरंग होजाय, तब उसको पका हुआ जान-कर निकाल लेवे । फिर उसमेसे रसको निकालकर एकएक पलकी मात्रासे पानकरे ।