भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४१


चिकनी मोटी और जिसको कीड़ोंने न खाया हो, ऐसी कुड़ेकी जड़की छालको लेकर तत्क्षण खूब बारीक कूटकर चावलोंके जलमें पीसलेवे । फिर उसको जामुनके पत्तोंमें लपेटकर और कुशासे बाँधकर उसके ऊपर गाढ़ी मिट्टीका लेप करके सुखालेवे । पश्चात् जब पककर शीतल होजाय तब उसमेंसे रसको निकाल लेवे । इस रसमें शहद मिलाकर अतिसारवाले रोगीको सेवन कराना चाहिये । यह प्रयोग सर्वप्रकारके अतिसाररोगको नष्ट करनेके लिये सम्पूर्ण योगोंका राजा है । यह योग कृष्णात्रेयमुनिका कहा हुआहै । ॥ ५८ ॥ ५९ ॥

श्योनाकपुटपाक ।

त्वक्पिण्डं दीर्घवृत्तस्य काश्मरीपत्रवेष्टितम् ।
मृदाऽवलिप्तं सुकृतमङ्गारेष्ववकूलयेत् ॥ ६० ॥
स्विन्नमुद्धृत्य निष्पीड्य रसमादाय यत्नतः ।
शीतीकृतं मधुयुतं पाययेदुदरामये ॥ ६१ ॥

अरलूकी जड़की छालको कूट पीसकर गोलासा बनालेवे । फिर उसको कुम्मेरके पत्तोंमें लपेटकर और ऊपरसे मिट्टीका लेप कर मन्द मन्द अग्निसे पुटपाक करना चाहिये । जब पककर शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर उसमेंसे रसको निचोड़ लेवे । उस रसको उचित मात्रासे शहदमें मिलाकर उदररोगोंमें सेवन करानेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ६० ॥ ६१ ॥

दाडिम-पुटपाक ।

दाडिमस्य फलं पिष्ट्वा पचेत् पुटविधानतः ।
तद्रसं मधुसंमिश्रं पिबेत् सर्वातिसारनुत् ॥ ६२ ॥

कच्चे अनारके फलको पीसकर पूर्वोक्त विधिसे पुटपाक करे । फिर उसके रसको निकालकर दो तोले परिमाण लकर मधुके साथ मिश्रितकर सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है ॥ ६२ ॥

कुटज-लेह ।

शतं कुटजमूलस्य क्षुण्णं तोयार्मणे पचेत् ।
क्वाथे पादावशेषेऽस्मिन् लेहं पूते पुनः पचेत् ॥ ६३ ॥
सौवर्चलयवक्षारविडसैन्धवपिप्पली ।
धातकीन्द्रयवाजाजीचूर्णं दत्त्वा पलद्वयम् ॥ ६४ ॥

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