भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४३
कर इस अवलेहको उचित मात्रासे माँड अथवा बकरीके दूधके साथ सेवन करें। यह कुटजाष्टक अवलेह सर्वप्रकारके भयंकर अतिसार, संग्रहणी, नानाप्रकारके रक्त-विकार, काला, सफेद, लाल, पीले और पित्तज अतिसार, बवासीर, रुधिरकी बवासीर और असाध्य रक्तप्रदररोगको भी अवश्य नष्ट करता है ॥ ६६–६९ ॥
दुग्ध-पानविधि ।
जीर्णेऽमृतोपमं क्षीरमतीसारे विशेषतः ।
छागं तद्भेषजैः सिद्धं पेयं वा वारिसाधितम् ॥ ७० ॥
विशेषकर पुराने अतिसारमें बकरीके दूधको अतिसारनाशक औषधियोंके साथ पकाकर अथवा केवल जलके साथ पकाकर देनेसे विशेष लाभ होता है ॥ ७० ॥
शोथातीसार-चिकित्सा ।
शोथघ्नीन्द्रयवाः पाठाश्रीफलातिविषाघनाः ।
क्वथिताः सोषणाः पीता। शोथातीसारनाशनाः ॥ ७१ ॥
पुनर्नवा, इन्द्रजौ, पाठ, बेलगिरी, अतीस और नागरमोथा इनका काथ, काली मिरचोंका चूर्ण बनाकर उसमें डालकर पान करनेसे शोथातीसार नष्ट होता है ७१
विडङ्गातिविषामुस्तं दारु पाठा कलिङ्गकम् ।
मरिचेन समायुक्तं शोथातीसारनाशनम् ॥ ७२ ॥
वायविडङ्ग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठ और इन्द्रजौ इनके काथमें काली-मिरचोंका चूर्ण डालकर पान करनेसे शोथयुक्त अतीसार नष्ट होता है ॥ ७२ ॥
भय-शोकज अतीसार-चिकित्सा ।
भयशोकसमुद्भूतौ ज्ञेयौ वातातिसारवत् ।
तयोर्वातहरी काया हर्षणाश्वासनैः क्रिया ॥ ७३ ॥
भय और शोकसे उत्पन्नहुए अतिसारोंको वातज अतिसारकी समान जानना चाहिये। अतः उक्त दोनों प्रकारके अतीसारोंमें वातनाशक चिकित्सा एवं हर्षजनक धैर्यप्रदान आदि कार्य करे ॥ ७३ ॥
पृश्निपर्ण्यादि ।
पृश्निपर्णीबलाबिल्वधान्यकोत्पलनागरैः ।
विडङ्गातिविषामुस्तदारुपाठाकलिङ्गकैः ॥
मरिचेन समायुक्तः शोकातीसारनाशनः ॥ ७४ ॥