भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २४४ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
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पृश्निपर्णी, खिरेंटी, बेलगिरी, धनियाँ, कुमोदिनी (नीलोफर), सोंठ, वायविडंग, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पाठ और इन्द्रजौ इनके क्वाथमें कालीमिर्चोंका चूर्ण मिलाकर सेवन करनेसे शोकजनित अतिसार दूर होता है ॥ ७४ ॥
रक्तातिसार-चिकित्सा ।
गुडेन खादितं बिल्वं रक्तातीसारनाशनम् ।
आमशूलविबन्धघ्नं कुक्षिरोगविनाशनम् ॥ ७५ ॥
बेलकी गिरीको गुडके साथ खानेसे रक्तातीसार तथा आम, शूल, मलकी बद्धता और कुक्षिरोग ये सब नष्ट होते हैं ॥ ७५ ॥
शल्लकीबदरीजाम्बूपियालाम्रार्जुनत्वचः ।
पीताः क्षीरेण मध्वाढ्याः पृथक् शोणितनाशनाः ॥ ७६ ॥
सालईकी जडकी छाल, बेरीकी छाल, जामुनकी छाल, चिरौंजीकी छाल, आमकी छाल या अर्जुनकी छाल इनमेंसे किसी एककी छालको पीसकर दूध और शहदके साथ मिलाकर पान करनेसे रक्तातिसार दूर होता है । ये प्रत्येक छाल रक्तस्रावको बन्द करनेवाली हैं ॥ ७६ ॥
पीतं मधुसितायुक्तं चन्दनं तण्डुलाम्बुना ।
रक्तातीसारजिद्रक्तपित्ततृड्दाहमेहनुत् ॥ ७७ ॥
शहद, मिश्री और लालचन्दन इनको समानभाग लेकर चावलोंके जलके साथ पान करनेसे रक्तातीसार, रक्तपित्त, तृषा, दाह और प्रमेहरोग नष्ट होता है ॥ ७७ ॥
कषायो मधुनां पीतस्त्वचा दाडिमवत्सकात् ।
सद्यो जयेदतीसारं सरक्तं दुर्निवारकम् ॥ ७८ ॥
अनारकी छाल और कुडेकी छालके क्वाथको शहदके साथ पान करनेसे दुर्जय रक्तातीसार तत्काल दूर होता है ॥ ७८ ॥
जम्ब्वाम्रामलकानां तु पल्लवानथ कुट्टयेत् ।
संगृह्य स्वरसं तेषामजाक्षीरेण योजयेत् ॥
तं पिबेन्मधुना युक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥ ७९ ॥
जामुन, आम और आमलेके पत्तोंको कूटकर उनका स्वरस निकालकर बकरीके दूध और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे रक्तातीसार निवारण होता है ॥ ७९ ॥