भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४५


बिल्वं छागपयःसिद्धं सितामोचरसान्वितम् ।
कलिङ्गचूर्णसंयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥ ८० ॥
बकरीके दूधमें बेलगिरीको पकाकर उसमें मिश्री, मोचरस और इन्द्रजौका चूर्ण डालकर पान करनेसे रक्तातीसार नष्ट होता है ॥ ८० ॥

ज्येष्ठाम्बुना तण्डुलीयं पीतं च ससितामधु ।
पीत्वा शतावरीकल्कं पयसा क्षीरभुग् जयेत् ॥
रक्तातिसारं पीत्वा वा तथा सिद्धं घृतं नरः ॥ ८१ ॥
चौलाईकी जडको चावलोंके पानीके साथ पीसकर उसमें मिश्री और शहद मिलाकर पान करनेसे रक्तातीसार नष्ट होता है। शतावरके कल्कको बकरीके दूधके साथ पान करनेसे और उसपर दूधके साथ भोजन करनेसे अथवा शतावरके क्वाथ और कल्कके द्वारा सिद्ध किये हुए घृतको पान करनेसे रक्तातीसार दूर होता है ॥ ८१ ॥

कुटजत्वक्कृतः क्वाथो घनीभूतः सुशीतलः ।
लेहितोऽतिविषायुक्तः सर्वातीसारनुद् भवेत् ॥ ८२ ॥
कुडेकी छालके क्वाथको पकाकर अवलेहकी समान गाढा बनालेवे। जब पक-कर शीतल होजाय तब उसमें अतीसका चूर्ण मिलाकर चाटनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है ॥ ८२ ॥

कुटजस्य पलं ग्राह्यमष्टभागजले शृतम् ।
तथैव विपचेद् भूयो दाडिमोदकसंयुतम् ॥ ८३
यावच्चैव लसीकाभं शृतं तमुपकल्पयेत् ।
तस्यार्द्धकर्षं तक्रेण पिबेद्रक्तातिसारवान् ॥
अवश्यमरणीयोऽपि मृत्योर्याति न गोचरम् ॥ ८४ ॥
कुडेकी छालको ४ तोले लेकर आठगुने जलमें पकावे और चतुर्थांश जल शेष रक्खे। फिर उस क्वाथको छानकर और उसमें अनारका रस डालकर फिर पूर्वोक्त विधिसे पकावे। जब वह पाक अवलेहके समान गाढा होजाय तब उतारलेवे। पश्चात् उसको एक तोला परिमाण मट्ठेके साथ मिलाकर सेवन करनेसे मृत्युके मुखमें पतित हुआ भी रक्तातिसारवाला रोगी अवश्य आरोग्य लाभ करता है ॥ ८३ ॥ ८४ ॥

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