भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

२४६ भैषज्यरत्नावली । [अतिसार-

कल्कस्तिलानां कृष्णानां शर्कराभागसंयुक्तः ।
आजेन पयसा पीतः सद्यो रक्तं नियच्छति ॥ ८५ ॥
कालेतिलोंको पीसकर उसमें चौथाई भाग खाँड मिलाकर बकरीके दूधके साथ सेवन करनेसे रक्तातिसार तत्काल दूर होता है ॥ ८५ ॥

निष्क्वाथ्य मूलममलं गिरिमल्लिकायाः
सम्यक् पलद्वितयमम्बु चतुःशरावे ।
तत्पादशेषसलिलं खलु शोषणीय
क्षीरे पलद्वयमिते कुशलैरजायाः ॥ ८६ ॥
प्रक्षिप्य माषकानष्टौ मधुनस्तत्र शीतले ।
रक्तातिसारी तं लीढ्वा नैरूज्यमधिगच्छति ॥ ८७ ॥
कुडेकी शुद्ध छालको ८ तोले लेकर ४ शराव ( ६४ तोले ) जलमें पकावे । जब चौथाई जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल होजानेपर उसको ८ तोले प्रमाण बकरीके दूधमें मिलाकर और ८ माशे शहद डालकर पान करनेसे रक्तातिसारवाला रोगी शीघ्रही आरोग्य लाभ करता है ॥ ८६ ॥ ८७ ॥

वटरोह तु संपिष्य श्लक्ष्णं तण्डुलवारिणा ।
तत्पिबेत् तक्रसंयुक्तमतीसाररुजापहम् ॥ ८८ ॥
बड़के अंकुरोंको चावलोंके पानीके साथ खूब बारीक पीसकर मट्ठेके साथ पान करनेसे अतीसाररोग दूर होता है ॥ ८८ ॥

तण्डुलजलपिष्टाङ्कोटमूलकर्षाद्धपानमपहरति ।
सर्वातिसारग्रहणीरोगसमूहं महाघोरम् ॥ ८९ ॥
अङ्कोट ( ढेरा ) वृक्षकी जडको आठ माशे लेकरः चावलोंके जलमें पीसकर पीनेसे सब प्रकारके भयङ्कर अतीसार, संग्रहणी आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ ८९ ॥

विशल्यकरणीक्वाथश्चाथवा कुक्कुटद्रजः ।
वारयेच्छोणितस्रावं रक्तातीसारमुल्बणम् ॥ ९० ॥
विशल्यकरणी ( रकपतिया घास ) का क्वाथ अथवा कुकुरौंदेका रस पान करतेही रक्तस्राव और प्रबल रक्तातिसार नष्ट होता है ॥ ९० ॥

पीत्वा सशर्करं क्षौद्रं चन्दनं तण्डुलाम्बुना ।
दाहं तृष्णां प्रमेहं च सद्यो रक्तं नियच्छति ॥ ९१ ॥