भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४७

मिश्री, शहद और चन्दनका चूर्ण इनको समान भाग लेकर चावलोंके जलके साथ पान करनेसे दाह, तृषा, प्रमेह और रक्तातिसार शीघ्र दूर होता है ॥ ९१ ॥

नवनीतं मधुयुतं लिह्वेद्वा सितया सह ।
नागकेशरसंयुक्तं रक्तसंग्रहणं परम् ॥
मधुपादं सितार्द्धांशं नवनीतं चतुर्गुणम् ॥ ९२ ॥

नैनीघीको शहदके साथ या मिश्रीके साथ किंवा नागकेशरके साथ सेवन करनेसे अथवा शहद १ भाग, मिश्री २ भाग और नैनीघी ४ भाग सबको एकत्र मिलाकर खानेसे रक्तस्राव बन्द होता है ॥ ९२ ॥

रसाञ्जनादिचूर्ण ।

रसाञ्जनं चातिविषां कुटजस्य फलत्वचम् ।
धातकीं शृङ्गबेरं च पिबेत्तण्डुलवारिणा ॥
क्षौद्रयुक्तं प्रणुदति रक्तातीसारमुल्बणम् ॥ ९३ ॥

रसौंत, अतीस, इन्द्रजौ, कुडकी छाल, धायके फूल और सोंठ इनके चूर्णको समान भाग लेकर चावलोंके जलमें पीसकर शहदके साथ सेवन करनेसे प्रबल रक्तातिसार नष्ट होता है ॥ ९३ ॥

नारायणचूर्ण ।

गुडूची वृद्धदारं च कुटजस्य फलं तथा ।
बिल्वं चातिविषा चैव भृङ्गराजं च नागरम् ॥ ९४ ॥
शक्राशनस्य चूर्ण च सर्वमेकत्र मेलयेत् ।
चूर्णमेतत्समं ग्राह्यं कुटजस्य त्वचोऽपि च ॥ ९५ ॥
गुडेन मधुना वापि लेहयेद् भिषजां वरः ।
शोथं रक्तमतीसारं चिरजं दुर्जयं तथा ॥ ९६ ॥
ज्वरं तृष्णां च कासं च पाण्डुरोगं हलीमकम् ।
मन्दानलं प्रमेहं च गुदजं च विनाशयेत् ॥
एतन्नारायणं चूर्ण श्रीनारायणभाषितम् ॥ ९७ ॥

गिलोय, विधारा, इन्द्रजौ, बेलगिरी, अतीस, भाँगरा, सोंठ और भाँग इन सबके चूर्णको समान भाग लेवे और सम्पूर्ण चूर्णकी बराबर भाग कुडेकी छालका चूर्ण लेकर सबको एकत्र मिलालेवे । इस चूर्णको पुराने गुड अथवा शहदके साथ