भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४८ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
|---|
सेवन करनेसे सूजन तथा बहुत पुराना और दुस्साध्य रक्तातिसार, ज्वर, तृषा, खाँसी, पाण्डुरोग, हलीमक, मन्दाग्नि, प्रमेह और गुदाके समस्त रोग शीघ्र नष्ट होतेहैं। इस नारायणचूर्णको श्रीनारायणने कहा है ॥ ९४-९७ ॥
गुदापाकमें विधि ।
गुददाहे प्रपाके वा पटोलमधुकाम्बुना ।
सेकादिकं प्रशंसन्ति छागेन पयसाऽपि वा ॥
गुदभ्रंशे प्रकर्त्तव्या चिकित्सा तत्प्रकीर्त्तिता ॥ ९८ ॥
अतिसारके कारण गुदामें दाह अथवा पाक होनेपर पटोलपात और मुलहठीक काथ अथवा बकरीके दूधसे गुदाद्वारको सिंचन करना चाहिये और गुदभ्रंशरोगमें कहीहुई चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ९८ ॥
साधारणातिसार-चिकित्सा ।
बिल्वादि ।
बिल्वचूतास्थिनिर्यूहः पीतः सक्षौद्रशर्करः ।
निहन्याच्छर्द्यतीसारं वैश्वानर इवाहुतिम् ॥ ९९ ॥
बेल और आमकी गुठलीके काथमें खांड और शहद डालकर पान करनेसे वमनयुक्त अतीसार निवारण होताहै ॥ ९९ ॥
पटोलादि ।
पटोलयवधन्याकक्वाथः पीतः सुशीतलः ।
शर्करामधुसंयुक्तश्छद्यतीसारनाशनः ॥ १०० ॥
परवल, जौ और धनियां इनके शितिल क्वाथमें मधु और खांड मिलाकर पान करनेसे वमन और अतीसाररोग नष्ट होताहै ॥ १०० ॥
प्रियंग्वादि ।
प्रियंग्वञ्जनमुस्ताख्यं पाययेत्तु यथाबलम् ।
तृष्णातीसारच्छर्दिघ्नं सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना ॥ १ ॥
फूलप्रियंगु, रसौंत और नागरमोथा इनके चूर्णको शहद और चावलोंके पानीके साथ मिलाकर जठराग्निके बलानुसार पान करानेसे तृषा, अतिसार, वमन आदि उपद्रव दूर होते हैं ॥ १०१ ॥
जम्ब्वादि ।
जम्ब्वाम्रपल्लवोशीरवटशुङ्गावरोहकम् ।
रसः क्वाथोऽथवा चूर्णं क्षौद्रेण सह योजितम् ॥ २ ॥