भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २५४ | भैषज्यरत्नावली । | [अतिसार - |
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जलेन मर्दयित्वा तु माषमात्रां वटीं चरेत् ।
खादेत्तोयानुपानेन सर्वातीसारशान्तये ॥ ३६ ॥
सेंधानमक, हरड, आमला, बहेडा, अजवायन, बेलगिरी और घरका धुआँ इन सबको समानभाग लेकर जलके साथ खरलकर एकएक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी एकएक गोली जलके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार शान्त होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
जातीफलरस ।
पारदाभ्रकसिन्दूरं गन्धं जातीफलं समम् ।
कुटजस्य फलं चैव धूर्त्तबीजानि टङ्कणम् ॥ ३७ ॥
व्योषं मुस्ताऽभया चैव चूतबीजं तथैव च ।
बिल्वकं सर्ज्जबीजं च दाडिमीफलवल्कलम् ॥ ३८ ॥
एतानि समभागानि निक्षिपेत् खल्लमध्यतः ।
विजयास्वरसेनैव मर्दयेत् श्लक्ष्णचूर्णितम् ॥ ३९ ॥
गुञ्जाफलप्रमाणां तु वटिकां कारयेद् भिषक् ।
एकां कुटजमूलत्वक्कषायेण प्रयोजयेत् ॥ ४० ॥
शुद्धपारा, अभ्रक, रससिन्दूर, शुद्ध गन्धक, जायफल, इन्द्रजौ, धतूरेके बीज सुहागा, साँठ पीपल, मिरच, नागरमोथा, हरड, आमकी गुठली, बेलगिरी, शालके बीज, अनारदाने और अनारका वक्कल इन सबको समानभाग लेकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर भाँगके रसमें खूब बारीक खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इसकी एकएक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल कुडेकी जडकी छालके काथके साथ सेवन करे ॥ ३७-४० ॥
आमातिसारं हरति कुरुते वह्निदीपनम् ।
मधुना बिल्वशुण्ठ्या च रक्तग्रहणिकां जयेत् ॥ ४१ ॥
शुण्ठीधान्यकयोगेन चातिसारं निहन्त्यसौ ।
जातीफलरसो ह्येष ग्रहणीगदहारकः ॥ ४२ ॥
यह रस आमातिसारको नष्ट करता है और जठराग्निको दीपन करता है । इस रसको शहद और बेलगिरीके साथ सेवन करनेसे रक्तजग्रहणी दूर होती है । साँठ और धनियेके काथके साथ सेवन करनेसे अतिसार एवं जायफलके काथके साथ सेवन करनेसे संग्रहणी रोग नष्ट होता है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥