भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६१


अभयनृसिंहरस ।

दरदं च विषं व्योषं जीरकं टङ्कणं समम् ।
गन्धकं चाभ्रकं चैव भागैकं शुद्धसूतकम् ॥ ४३ ॥
आफूकं सर्वतुल्यं स्यान्मर्दयेन्निम्बुकद्रवैः ।
एकैकं भक्षयेच्चानु जीरकं मधुना सह ॥ ४४ ॥
त्रिदोषोत्थमतीसारं सज्वरं वाथ विज्वरम् ।
सर्वरूपमतीसारं संग्रहग्रहणीं जयेत् ।
रसोऽभयनृसिंहोऽयमतीसारे सुपूजितः ॥ ४५ ॥

सिंगरफ, शुद्ध मीठा तेलिया, सोंठ, पीपल, मिरच, जीरा, सुहागा, शुद्ध गन्धक, अभ्रक और शुद्धपारा ये सब समान भाग और अफीम सबके बराबर भाग लेवे । फिर सबको नींबूके रसमें खरल कर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन १-१ गोली शहदके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज अतिसार, ज्वरसहित व ज्वररहित अतिसार और संग्रहणीरोग नष्ट होता है । यह अभयनृसिंहनामक रस अतिसाररोगकी परमोत्तम औषधि है । ॥ ४३-४५ ॥


आनन्दभैरवरस ।

दरदं मरिचं टङ्कममृतं मागधी समम् ।
श्लक्ष्णपिष्टं तु गुञ्जैकं रसमानन्दभैरवम् ॥ ४६ ॥
लेहयेन्मधुना चानु कुटजस्य फलत्वचः ।
चूर्णितं कर्षमात्रं तु त्रिदोषोत्थातिसारजित् ॥ ४७ ॥
दध्यन्नं दापयेत् पथ्यं दध्याजं तक्रमेव च
पिपासायां जलं देयं विजया च हिता निशि ॥ ४८ ॥

सिंगरफ, मिरच, सुहागा, शुद्धमीठा तेलिया और पीपल इनको समान भाग लेकर खूब बारीक पीसकर जलमें खरलकरके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस आनन्दभैरव नामक रसकी एक एक गोली मधुके साथ सेवन करें, और ऊपरसे इन्द्रजौ तथा कुडेकी जड़की छालके चूर्णको एकएक तोला परिमाण लेकर शहदके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतिसार नष्ट होता है । इसपर बकरीके दूध, दही और मट्ठेके साथ भातका पथ्य देवे । प्यास लगनेपर जल पान करना और रात्रिमें भाँगको सेवन कराना उपयोगी है ॥ ४६-४८ ॥