भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २९६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
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कर्पूररस ।
हिङ्गुलं चाहिफेनं च मुस्तकेन्द्रयवं तथा ।
जातीफलं च कर्पूरं सर्वं संमर्द्य यत्नतः ॥
जलेन वटिका कार्या द्विगुञ्जापरिमाणतः ॥ ४९ ॥
ज्वरातिसारिणे चैव तथाऽतीसाररोगिणे ।
ग्रहणीषट्प्रकारे च रक्तातीसार उल्बणे ॥ १५० ॥
हिंगुल, अफीम, नागरमोथा, इन्द्रजौ, जायफल और कपूर इन सबको समान भाग लेकर जलमें उत्तमप्रकारसे खरलकरके दोदो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह कर्पूररस ज्वरातिसारवाले तथा साधारण अतिसारवाले रोगीके लिये एवं छः प्रकारकी संग्रहणी और प्रबलरक्तातिसारमें हितकारी है ॥ ४९ ॥ १५० ॥
बर्बूरारिष्ट ।
तुलाद्वयं च बर्बूरं चतुर्द्रोणे जले पचेत् ।
द्रोणशेषे रसे शीते गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ॥ ५१ ॥
धातकीं षोडशपलां कृष्णां द्विपलिको तथा ।
जातीफलानि कक्कोलं त्वगेलापत्रकेशरम् ॥ ५२ ॥
लवङ्गं मरिचं चैव पलिकान्युपकल्पयेत् ।
मासं भाण्डे स्थितस्त्वेष बब्बूरारिष्टको जयेत् ।
क्षयं कुष्ठमतीसारं प्रमेहश्वासकासकान् ॥ ५३ ॥
बबूलकी छालको २०० पल लेकर चार द्रोण जलमें पकावे । जब पककर एक द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल होजानेपर उसमें १०० पल गुड़ डाले एवं धायके फूल ६४ तोले, पीपल ८ तोले तथा जायफल, शीतलचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग और कालीमिरच इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले डालदेवे । सबको एक मिट्टीके पात्रमें भरकर और उसके मुँहको बन्द करके एक महीनेतक रखा रहने देवे तो यह बर्बूरारिष्ट सिद्ध होता है। यह अरिष्ट क्षय, कुष्ठ, सर्वप्रकारके अतिसार प्रमेह, श्वास, कास आदि व्याधियोंको नष्ट करता है ॥ ५१–५३ ॥
कुटजारिष्ट ।
तुलां कुटजमूलस्य मृद्वीकार्द्धतुलां तथा ।
मधूकपुष्पकाश्मर्य्योर्भागान् दशपलोन्मितान् ॥ ५४ ॥