भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २६७
चतुर्द्रोणेऽम्भसः पत्क्वा द्रोणं चैवावशेषितम् । धातक्या विंशतिपलं गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ॥ ५५ ॥ मासमात्रं स्थितो भाण्डे कुटजारिष्टसंज्ञितः । ज्वरान् प्रशमयेत्सर्वान् कुर्यात्तीक्ष्णं धनञ्जयम् । दुर्वारं ग्रहणीं हन्ति रक्तातीसारमुल्बणम् ॥ ५६ ॥
कुडेकी जड़की छाल सौ पल, दाख ५० पल, महुएके फूल १० पल और कुम्भे-रकी छाल १० पल लेकर चार द्रोण जलमें पकावे । जब पककर एक द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें धायके फूल एक सेर और गुड़ सौ पल डालकर एक उत्तम मृत्तिकाके पात्रमें भरकर और उसके मुँहको बन्द करके एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । फिर एक महीने पीछे इसको निकालकर छानलेवे । इसको कुटजारिष्ट कहते हैं । यह अरिष्ट यथोचित मात्रासे सेवन करनेपर सर्व प्रकारके ज्वर दुःसाध्य संग्रहणी और प्रबल रक्तातिसारको शीघ्र नष्ट करता है और अग्निको दीपन करता है ॥ ५४–५६ ॥
अहिफेनासव ।
तुलां मधुकमद्यस्य शुभे भाण्डे निधापयेत् । फणिफेनस्य कुडवं मुस्तकं पलसम्मितम् ॥ ५७ ॥ जातीफलं चेन्द्रयवं तथैलां तत्र दापयेत् । मासमात्रं स्थितो भाण्डे यत्नतः परिरक्षयेत् । हन्त्यतीसारमत्युग्रं विषूचीमपि दारुणाम् ॥ ५८ ॥
महुएकी मद्य सौ पल, अफीम १६ तोले एवं नागरमोथा, जायफल, इन्द्रजौ और इलायची ये प्रत्येक ४-४ तोले लेवे। सबको एकत्र पीसकर एक उत्तम मिट्टीके बरतनमें भरकर और उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे बन्द करके एक महीनेतक रक्खा रहनेदेवे । तत्पश्चात् उसको छानकर उचित मात्रासे सेवन करे तो यह अहिफेनासव अत्यन्त भयंकर अतीसार और विषूचिकाको शमन करता है ॥
ग्रहण्यां ये रसा वाच्यास्तेऽतीसारे नियोजिताः । हन्युः सर्वमतीसारं शिवस्याज्ञा विशेषतः ॥ ५९ ॥
ग्रहणीरोगमें जो रस कहे जायंगे उन सबको विशेषकर अतिसाररोगमें भी प्रयोग करना चाहिये उनसे सर्व प्रकारके अतिसार नष्ट होते हैं ॥ ५९ ॥
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