भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५८ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार-
अतीसारमें वर्जनीय ।
स्नानाभ्यङ्गाऽवगाहांश्च गुरुस्निग्धातिभोजनम् ।
व्यायाममग्निसन्तापमतिसारी विवर्जयेत् ॥ १६० ॥
अतिसारवाले रोगीको स्नान, तैलमर्दन, जलमें घुसकर स्नान करना एवं गुरुपाकी और स्निग्ध पदार्थोंका भोजन, अधिक भोजन, व्यायाम और अग्निका ताप यह सब तत्काल त्यागदेने चाहिये ॥ १६० ॥
अतीसारमें पथ्य ।
वमनं लङ्घनं निद्रा पुराणाः शालिषष्टिकाः ।
विलेपी लाजमण्डश्च मसूरतूवरीरसः ॥ ६१ ॥
शशैणलावहरिणकपिञ्जलभवा रसाः ।
सर्वे क्षुद्रझषाः शृङ्गी खल्लिशो मधुरालिका ॥ ६२ ॥
तैलं छागघृतक्षीरे दधि तक्रं गवामपि
दधिजं वा पयोजं वा नवनीतं गवाजयोः ॥ ६३ ॥
नवं रम्भापुष्पफलं क्षौद्रं जम्बूफलानि च ।
भव्यं महार्द्रकं विश्वं शालूकं च विकङ्कतम् ॥ ६४ ॥
कपित्थं वकुलं बिल्वं तिन्दुकं दाडिमद्वयम् ।
तालकं कश्चटदलं चाङ्गेरी विजयाऽरुणा ।
अन्नपानानि सर्वाणि दीपनानि लघूनि च ॥ ६५ ॥
वमन, लंघन, पुराने शालिधानोंके चावल और साँठीके चावल, विलेपी, खीलोंका माँड, मसूर और अरहरका यूष एवं खरगोश, कालेहिरन, लवा, हिरन और कपिञ्जल इनके मांसका रस, सर्व प्रकारकी छोटी मछलियाँ, शृंगीमछली, खल्लिश मछली, क्षुद्रमछली, गाय बकरीका घी, दूध, दही, मठा, दहीका निकाला हुआ या दूधका निकाला हुआ नैनीघी या मक्खन, केलेके नवीन फल-फूल, शहद, जामुन, लिसोडा (किसीके मतमें कमरख), अदरख, सोंठ, भसीडा, कण्टाई, कैथ, मौलसिरीके फूल, बेलगिरी, तेंदु, खट्टे-मीठे दोनों प्रकारके अनार, ताडके अनार, ताडके फल, जल चौलाई, नोनियाका शाक, भाँग, रक्तवर्णकी चौलाईका शाक एवं सर्व प्रकारके हल्के और अग्निप्रदीपक अन्न पान अतिसार रोगमें हितकर हैं ॥ ६१-६५ ॥