भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २७१
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहा, अभ्रक, हींग, पाँचोंनमक, हल्दी, दारुहल्दी, कूठ, वच, नागरमोथा, वायविडङ्ग, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, चीतेकी जड, अजमोद, अजवायन, गजपीपल, सज्जी, जवाखार, सुहागा और घरका धुआँ इन प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला और समस्त चूर्णके बराबर भाँगका चूर्ण लेकर सबको एकत्र मिलालेवे । इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल दो दो माशे चूर्ण शालिधानोंके चावलोंके पानीके साथ सेवन करनेसे संग्रहणीरोग दूर होता है और अग्नि बडवानलकी समान अत्यन्त दीपन होती है । एवं सब प्रकारके अतीसार ओर सबप्रकारका आमातिसार, तृषा, ज्वर, पक्व अथवा अपक्व अनेक वर्णका और पीडायुक्त अतिसार, सूजन, असाध्य ग्रहणी, पाण्डु, प्लीहा, जीर्णज्वर एवं अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगसमूहको नाश करनेके लिये विशेषकर यह ग्रहणीशार्दूलचूर्ण सिंहके समान है ॥ ६८-७३ ॥
जातीफलाद्यचूर्ण।
जातीफलं विडङ्गानि चित्रकं तगरं तथा ।
तालीशं चन्दनं शुण्ठी लवंगं चोपकुञ्चिका ॥ ७४ ॥
कर्पूरं चाभया धात्री मरिचं पिप्पली तुगा ।
एषामक्षसमान् भागांश्चातुर्जातकसम्मितम् ॥ ७५ ॥
ग्रहणीमतिसारं च वह्निमान्द्यं सपीनसम् ।
वातश्लेष्मभवान् रोगान् प्रतिश्यायांश्च दुःसहान् ॥ ७६ ॥
जायफल, वायविडङ्ग, चीतेकी जड, तगर, तालीसपत्र, लालचन्दन, सोंठ, लौंग, कालाजीरा, कपूर, हरड, आमला, मिरच, पीपल, वंशलोचन, दारचीनी, तेजपात, इलायची और नागकेशर इन सबको एकएक तोला लेकर बारीक पीसकर चूर्ण करलेवे । यह चूर्ण ग्रहणी, अतिसार, मन्दाग्नि, पीनस, वात-कफजन्यरोग और दुस्साध्य प्रतिश्यायको शीघ्र नष्ट करताहै ॥ ७४-७६ ॥
जीरकाद्यचूर्ण।
जीरकं टङ्कणं मुस्तं पाठा बिल्वं सधान्यकम् ।
बालकं शतपुष्पा च दाडिमं कुटजं तथा ॥ ७७ ॥
समङ्गा धातकीपुष्पं व्योषं चैव त्रिजातकम् ।
मोचारसं कलिङ्गं च व्योम गन्धकपारदौ ॥ ७८ ॥
यावन्त्येतानि चूर्णानि तावज्जातीफलानि च ।
एतत् प्राशितमात्रेण ग्रहणीं दुस्तरां जयेत् ॥ ७९ ॥