भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२७२ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

अतीसारं निहन्त्याशु सामं नानाविधं तथा ।
कामलां पाण्डुरोगं च मन्दाग्निं च विशेषतः ॥
जीरकाद्यमिदं चूर्णमगस्त्येन प्रकाशितम् ॥ ८० ॥

जीरा, सुहागा, नागरमोथा, पाठ, बेलगिरी, धनियाँ, सुगन्धवाला, सोया, अना-
रके बक्कल, कुडेकी छाल, लज्जावंती, धायके फूल, सोंठ, पीपल, मिरच, दारचीनी,
तेजपात, इलायची, मोचरस, इन्द्रजौ, अभ्रक, शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धककी
कज्जली इन सबके चूर्णको समान भाग लेवे और जितना इन सब औषधियोंका
चूर्ण हो उस सबकी बराबर जायफलका चूर्ण लेकर मिलालेवे । इस चूर्णको एक-
एक माशेकी मात्रासे सेवन करतेही कठिन संग्रहणी, आमयुक्त तथा विविधप्रका-
रका अतिसार, कामला, पाण्डुरोग और विशेषकर मन्दाग्निः ये सब रोग तत्काल
दूर होते हैं । इस जीराकाद्यचूर्णको अगस्त्यऋषिने प्रकाशित किया है ॥७७-८०॥

मार्कण्डेयचूर्ण ।

शुद्धसूतं च गन्धं च हिङ्गुलं टङ्कणं तथा ।
व्योषं जातीफलं चैव लवङ्गं तेजपत्रकम् ॥ ८१ ॥
एलाबीजं चित्रकं च मुस्तकं गजपिप्पली ।
नागरं सजलं चाभ्रं धातक्यतिविषा तथा ॥ ८२ ॥
शिग्रुजं शाल्मलं चैवमहिफेनं पलाशकम् ।
एतानि समभागानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ८३ ॥
खादेदस्मात् प्रतिदिनं माषकं सितया सह ।
संग्रहग्रहणीं हन्ति मन्दाग्निं च विनाशयेत् ॥ ८४ ॥
धातुवृद्धिं वयोवृद्धिं बलपुष्टिं करोत्यपि ।
मार्कण्डेयमिदं चूर्णं महादेवेन निर्मितम् ॥ ८५ ॥

शुद्धपारे और शुद्ध गन्धककी कज्जली, सिंगरफ, सुहागा, सोंठ, पीपल, मिरच,
जायफल, लौंग, तेजपात, इलायचीके दाने, चीतेकी जड, नागरमोथा, गजपीपल,
सोंठ, सुगन्धवाला, अभ्रक, धायके फूल, अतीस, सहिजनेके बीज, मोचरस और
अफीम ये प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर सबका एकत्र बारीक चूर्ण करलेवे।
इसमैसे प्रतिदिन एक एक माशा चूर्ण चार तोले मिश्रीके साथ मिलाकर सेवन करे
तो यह चूर्ण प्रवल संग्रहणी और अग्निकी मन्दताको नष्ट करता है और धातुकी

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