भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २७३
वृद्धि, आयुकी वृद्धि, बलकी वृद्धि तथा पुष्टिको करता है । इस मार्कण्डेय चूर्णको श्रीमहादेवजीने कहा है ॥ ८१-८५ ॥
कञ्चटावलेह ।
प्रस्थे पचेत् कंचटतालमूल्यौ सितार्द्धप्रस्थं शृतपादशेषे ।
ततोऽक्षमात्राणि समानि दद्याच्चूर्णानि धीरो विधिवत्तदेषाम् ॥
समङ्गा धातकी पाठा बिल्वं मुस्ताऽथ पिप्पली ।
शक्रकातिविषाक्षारसौवर्चलरसाञ्जनम् ॥ ८७ ॥
शाल्मलीवेष्टकं चैव सर्वं सिद्धे निधापयेत् ।
शीते च मधुनश्चात्र कुडवार्द्धं विनिक्षिपेत् ॥ ८८ ॥
जलपीपल और मूसली इन दोनोंको आठ आठ पल लेकर एक प्रस्थ जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें ३२ तोले मिश्री और लज्जावन्ती, धायके फूल, पाठ, बेलगिरी, नागरमोथा, पीपल, भाँग, अतीस, जवाखार, कालानमक, रसौंत और मोचरस इन प्रत्येक औषधिको डालकर पकावे । जब पककर अवलेहके समान गाढा होजाय तब चूर्णको बारीक पीसकर डालदेवे । जब अच्छे प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानपर उसमें ८ तोले शहद मिलादेवे ॥ ८६-८८ ॥
अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत यथाकालप्रमाणतः ।
सर्वातीसारं शमयेत् संग्रहग्रहणीं तथा ॥ ८९ ॥
अम्लपित्तकृतं दोषमुदरं सर्वरूपिणम् ।
विकारान् कोष्ठजान् हन्ति हन्यात् शूलमरोचकम् ॥ ९० ॥
इस अवलेहको दोष, काल और अवस्थाका विचारकर उपयुक्त मात्रासे सेवन करे तो यह सब प्रकारके अतिसार, संग्रहणी, अम्लपित्त, अजीर्ण, उदररोग, कोष्ठगतरोग, शूल, अरुचि एवं अन्यान्य सर्वप्रकारके विकारोंको दूर करता है ॥ ८९ ॥ ९० ॥
दशमूलगुड ।
दशमूलीपलशतं जलद्रोणे विपाचयेत् ।
तेन पादावशेषेण पचेद् गुडतुलां भिषक् ॥ ९१ ॥
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