भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २७५

शाम्यन्ति चायं चिरमन्तराग्नेर्हतस्य पुंस्त्वस्य च वृद्धिहेतुः । स्त्रीणां च वन्ध्यामयनाशनोऽयं कल्याणको नाम गुडः प्रदिष्टः ॥ त्रिवृतां भर्ज्यन्त्यत्र मनाक् तैले चिकित्सकाः । अत्रोक्तमानसाधर्म्यात्त्रिसुगन्धिपलं पृथक् ॥ १०१ ॥

शुद्ध आमलोंके तीन प्रस्थ रसमें पीपलामूल, जीरा, चव्य, सोंठ, मिरच, पीपल, गजपीपल, हाऊबेर, अजमोद, वायविडङ्ग, सेंधानमक, हरड, आमला, बहेडा, अजवायन, पाठ, चीतेकी जड और धनियाँ इन प्रत्येकको चारचार तोले तेलमें भुना हुआ निसोतका चूर्ण ३२ तोले, तिलका तैल ३२ तोले और दालचीनी, तेजपात, इलायची इन प्रत्येकका चूर्ण ६४ तोले इन सबको मिलाकर यथाविधिसे गुड दो दो तोले डालकर पाककर पकावे । जब पाक उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब उसमें त्रिसुगन्धि ( दारचीनी, तेजपात, इलायची ) का चूर्ण चारचार तोले मिलाकर प्रतिदिन एकएक तोला प्रमाण भक्षण करे । इससे सर्व प्रकारकी संग्रहणी, श्वास, खाँसी, स्वरभेद और सूजन दूर होती है तथा बहुत दिनोंकी पुरानी मन्दाग्नि दीपन होती है और पुरुषत्वकी वृद्धि होती है । यह कल्याण नामक गुड वन्ध्या स्त्रियोंके वन्ध्यात्व दोषको निवारण करनेकी सर्वश्रेष्ठ महौषध है ॥ ९७-१०१ ॥

कूष्माण्डगुडकल्याण ।

कूष्माण्डकानां रूढानां सुस्विन्नं निष्कुलत्वचम् । सर्पिःप्रस्थे पलशतं ताम्रभाण्डे शनैः पचेत् ॥ २ ॥ पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पली । धान्यकानि विडङ्गानि यमानीमरिचानि च ॥ ३ ॥ त्रिफला चाजमोदा च कलिङ्गाजाजिसैन्धवम् । एकैकस्य पलं चैव त्रिवृदष्टपलं भवेत् ॥ ४ ॥ तैलस्य च पलान्यष्टौ गुडपञ्चाशदेव तु । प्रस्थैस्त्रिभिः समेतं तु रसस्यामलकस्य च ॥ ५ ॥ यदा दर्वीप्रलेपस्तु तदैनमवतारयेत् । यथाशक्ति गुडान् कुर्यात् कर्षकर्षार्द्धमानकान् ॥ ६ ॥

उत्तम प्रकारसे पके हुए पेठेको लेकर छील लेवे । फिर उसके टुकडे करके १०० पल, घी १ प्रस्थ एवं पीपल, पीपलामूल, चीतेकी जड, अजमोद, इन्द्रजौ, कालाजीरा