भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-
और सैंधानमक इन प्रत्येकका चार-चार तोले चूर्ण, निसोतका चूर्ण ३२ तोले, तिलका तैल ३२ तोले, गुड पचास पल और आमलोंका रस ३ प्रस्थ लेवे सबको एकत्र मिलाकर ताँबेके पात्रमें विधिपूर्वक मन्दमन्द अग्निसे पकावे । जब पकते २ करछीसे लग तब उसको नीचे उतारले फिर उसमेंसे अपनी अग्निके बलानुसार ६ माशेकी मात्रासे लेकर एक तोलापर्यन्त सेवन करे ॥ १०२-१०६ ॥
अनेन विधिना चैव प्रयुक्तस्तु जयेदिमान् । प्रसह्य ग्रहणीरोगान् कुष्ठान्यर्शोभगन्दरान् ॥ ७ ॥ ज्वरमानाहहृद्रोगगुल्मोदरविषूचिकाः । कामलापाण्डुरोगांश्च प्रमेहांश्चैव विंशतिम् ॥ ८ ॥ वातशोणितवीसर्पदद्रुचर्म्महलीमकान् । कफपित्तानिलान् सर्वान् प्ररूढांश्च व्यपोहति ॥ ९ ॥ व्याधिक्षीणा वयःक्षीणाः स्त्रीषु क्षीणाश्च ये नराः । तेषां वृष्यश्च बल्यश्च वयःस्थापन एव च । गुडकल्याणको नाम वन्ध्यानां गर्भदः परः ॥ ११० ॥
इसको प्रतिदिन नियमानुसार सेवन करनेसे संग्रहणी, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, ज्वर, आनाह, हृदयरोग, गुल्म, उदरविकार, विषूचिका, कामला, पाण्डुरोग, बीस प्रकारके प्रमेह, वातरक्त, विसर्प, दाद, चर्मरोग, हलीमक तथा कफ, पित्त और वायुसे उत्पन्न हुए सर्वप्रकारके बहुत पुराने रोग नष्ट होते हैं। जो मनुष्य व्याधिके कारण क्षीण हो गये हैं या अवस्थासे ही क्षीण हैं अथवा जो स्त्रियोंमें अधिक भोगविलास करनेसे क्षीण हो गये हैं, उनके लिये यह गुड अत्यन्त वृष्य, बलकारक और आयुको स्थापन करनेवाला है । इसको कूष्माण्डगुडकल्याण कहते हैं । यह वन्ध्यास्त्रियोंके लिये गर्भप्रदान करता है ॥ १०७-११० ॥
कामेश्वरमोदक ।
सम्यङ् मारितमभ्रकं कटफलं कुष्ठाश्वगन्धामृता मेथी मोचरसो विदारिमुसलीगोक्षूरकं चेक्षुरः । रम्भाकन्दशतावरीत्वजमुदा मांसी तिला धान्यकं यष्टी नागबला कचूरमदनं जातीफलं सैन्धवम् ॥ ११ ॥ भार्ङ्गी कर्कटशृङ्गकं त्रिकटुकं जीरद्वयं चित्रकं चातुर्जातपुनर्नवा गजकणा द्राक्षा शठी बालकम् ।