भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी- |
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ग्रहणीं दुस्तरां हन्ति श्वासं कासमतीव च
आमवातमग्निमान्द्यमजीर्णं विषमज्वरम् ॥ ७४ ॥
विबन्धानाहशूलं च यकृत्प्लीहोदराणि च ।
हन्त्यष्टादशकुष्ठानि ग्रहणीदोषनाशनः ।
उदावर्त्तगुल्मरोगोदरामयविनाशनः ॥ ७५ ॥
इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एकएक कर्षप्रमाण भक्षण करे और ऊपरसे शीतल-जल अथवा बकरीका दूध पान करे । यह मोदक दुस्तरग्रहणी, श्वास, खाँसी, आमवात, मन्दाग्नि, अजीर्ण, विषमज्वर, विबन्ध, आनाह, शूल, यकृत्, प्लीहा, उदररोग, १८ प्रकारके कुष्ठ, ग्रहणीके सब उपद्रव, उदावर्त्त, गुल्म और सर्वप्रकारके उदरविकारोंको शीघ्र नष्ट करते हैं ॥ ७३-१७५ ॥
हंसपोट्टली ।
दग्धान्कपर्दकान् पिष्ट्वा त्र्यूषणं टङ्कणं विषम् ।
गन्धकं शुद्धसूतं च तुल्यं जम्बीरजैर्द्रवैः ॥ ७६ ॥
मर्दयेद् भक्षयेन्माषं मरिचाज्यं लिहेदनु ।
निहन्ति ग्रहणीरोगं पथ्यं तकौदनं हितम् ॥ ७७ ॥
कौडीकी भस्म, सोंठ, पीपल, मिरच, सुहागा, शुद्ध मीठातेलिया, शुद्ध गन्धक और शुद्धपारा इन सबको समानभाग लेकर जम्बोरीनीबूके रसमें उत्तमप्रकारसे खरल करले । फिर प्रतिदिन एकएक माशे प्रमाण लेकर मिरचोंके चूर्ण और घीमें मिलाकर सेवन करना चाहिये । यह औषधि संग्रहणीरोगको नष्ट करतीहै । इसपर मट्ठे और भातका पथ्य देना हितकरहै ॥७६॥७७॥
ग्रहणीकपर्दपोट्टली ।
कपर्दतुल्यं रसकं तु गन्धकं लौहं मृतं टङ्कणं च तुल्यम् ।
जयारसेनैकदिनं विमर्द्य चूर्णेन संवेष्ट्य पुटेच्च भाण्डे ॥
ददीत तत्पोट्टलिकाभिधानं वातप्रधानग्रहणीनिवृत्त्यै ॥ ७८ ॥
कौडीकी भस्म, शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, लोहभस्म और सुहागा इन सबको समान भाग लेकर एकत्रकर भांगके रसमें एकदिनतक अच्छेप्रकारसे मर्दन करके गोलासा बनालेवे । उसको चूनसे लपेटकर एक बर्त्तनमें बन्दकर पुटपाकविधिसे पाककरे । जब पककर स्वयं शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर चूर्ण करलेवे । इस ग्रहणीकपर्दपोट्टलीनामरसको वातजसंग्रहणीरोगमें प्रयोग करना चाहिये ॥१७८