भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 317

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २८५


ये मोदक प्रतिदिन प्रातःकाल दोष तथा अग्निके बलाबलको विचारकर भक्षण करने और ऊपरसे मिश्री मिलाकर गायका दूध पान करना चाहिये । यह प्रयोग अस्सी प्रकारके वातज, ४० प्रकारके पित्तज और अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको इस प्रकार नष्ट करदेता है जैसे वज्र वृक्षोंको तत्काल नाश करदेता है । एवं अनेक अतिसार, विशेषकर आमातिसार, आठ प्रकारका शूल, बहुत पुराना अर्शरोग, जीर्णज्वर, सततज्वर और विषमज्वरको नष्ट करता है । तथा वन्ध्या स्त्रियोंको पुत्र देनेवाला, दुर्बल मनुष्योंको पुष्ट करनेवाला और अत्यन्त बल वर्णको बढानेवाला है । प्रसूताके दारुण रोग प्रदररोग, वातिक व पैत्तिक सर्वशरीरकी दाह आदि रोगोंको निस्सन्देह दूर करता है ॥ ६३–६८ ॥

अग्निकुमारमोदक ।

उशीरं बालकं मुस्तं त्वक् पत्रं नागकेशरम् ।
जीरद्वयं च शृंगं च कट्फलं पुष्करं शठी ॥ ६९ ॥
त्रिकटु बिल्वकं धान्यं जातीफललवंगकम् ।
कर्पूरं कान्तलौहं च शैलजं वंशलोचना ॥ ७० ॥
एलाबीजं जटामांसी रास्ना तगरपाडुकम् ।
समंगाऽतिबला चाभ्रं मुरा वङ्गं तथैव च ॥ ७१ ॥
अस्य चूर्णसमा मेथी चूर्णाद्धं विजयारजः ।
शर्करामधुसंयुक्तं मोदकं परिकल्पयेत् ॥ ७२ ॥

खस, सुगन्धवाला, नागरमोथा, दालचीनी, तेजपात, नागकेशर, जीरा कालाजीरा, काकडासिंगी, कायफल, पुष्करमूल, कचूर, सोंठ, पीपल, मिरच, बेलगिरी, धानियाँ, जायफल, लौंग, कपूर, कान्तलोह, भूरिछरीला, वंशलोचन, इलायची, बालछड, रायसन, तगर, लज्जावंती, कंघी, अभ्रक, मुरामांसी और वंग; इन सबका चूर्ण समानभाग और समस्त चूर्णके बराबर मेथीका चूर्ण एवं मेथीके चूर्णसहित सबचूर्णसे आधाभाग भाँगका चूर्ण और सम्पूर्ण चूर्णसे दूनी शुद्ध खाँड मिश्री लेवे । सबको यथाविधिसे एकत्रितकर शहद डालकर मोदक बनालेवे ॥ ६९–७२ ॥

एककर्षप्रमाणं तु भक्षयेत् प्रातरुत्थितः ।
शीततोयानुपानेन आजेन पयसाऽथवा ॥ ७३ ॥