भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२८८ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

२—शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, जायफल और लवंग ये प्रत्येक औषधि चार चार माशे लेकर बारीक पीसलेवे। फिर हुलहुल, बेलके पत्ते और सिंघाडेके पत्ते इन प्रत्येकके चार चार तोले रसमें उत्तम प्रकारसे खरल करके तेजधूपमें सुखाकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली बेलके पत्तोंके रसके साथ सेवन करनी चाहिये और इसपर दहीके सात भातका भोजन करना चाहिये। इसके सेवनसे संग्रहणी, पाण्डुरोग, अतीसार, सूजन और ज्वर ये सब रोग नष्ट होते हैं। यह ग्रहणीकपाटनामवाला रस अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ८३-८६ ॥

श्वेतसर्जस्य शुद्धस्य गन्धकस्य रसस्य च ।
शुभेऽह्नि पृथगादाय चूर्णं माषचतुष्टयम् ॥ ८७ ॥
एकीकृत्य शिलाखल्ले दद्यात्तेषां तदा रसम् ।
सूर्यावर्त्तस्य बिल्वस्य शृंगाटस्य च पत्रजम् ॥ ८८ ॥
प्रत्येकं पलमेकैकं दापयेद्ग्रहणीगदे ।
दापयित्वा ततो यत्नाद्दधिभक्तं समाचरेत् ॥ ८९ ॥
असंवृतगुदद्वारं कपाटमिव ढक्कयेत् ।
अतश्च ग्रहणीरोगे कपाटोऽयं रसः स्मृतः ॥ १९० ॥

३—सफेद राल, शुद्ध गंधक और शुद्धपारा इनको शुभदिनमें अलग अलग चार चार माशे लेकर चूर्ण करलेवे। फिर पत्थरके खरलमें डालकर हुलहुल, बेल और सिंघाडेके पत्तोंका रस चार चार तोले डालकर पृथक् पृथक् खरल करे और दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे एक एक गोली सेवन करनेसे और इसपर दहीके साथ भातका भोजन करनेसे ग्रहणीरोग दूर होता है। यह रस खुले हुए गुदाके द्वारको किंवाडोंकी समान ढक देता है। इसलिये इसे ग्रहणीकपाटरस कहते हैं ॥ ८७-१९० ॥

गिरिजाभवबीजकज्जली परिमर्द्यार्द्ररसेन शोषिता ।
कुटजस्य तु भस्मना पुनर्द्विगुणेनाथ विमर्द्य मिश्रिता ॥ ९१॥
मर्दयित्वा प्रदातव्यमस्य गुञ्चाचतुष्टयम् ।
अजाक्षीरेण दातव्यं क्वाथेन कुटजस्य वा ॥ ९२ ॥
यूषं देयं मसूरस्य वारि भक्तं च शीतलम् ।
दध्ना सह पुनर्देयं ग्रासादौ रक्तिकाद्वयम् ॥ ९३ ॥

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