भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २८९
वर्द्धयेद्दशपर्यन्तं ह्रासयेत् क्रमशस्तथा ।
निहन्ति ग्रहणीं सर्वां विशेषात् कुक्षिमार्दवम् ॥ ९४ ॥
४-शुद्धपारा १ तोला और शुद्ध गन्धक १ तोला दोनोंकी एकत्र कज्जली बना-
कर उसमें ४ तोले कुडेकी छालकी भस्म मिलाकर अदरखके रसमें खरल करे ।
फिर छायामें सुखाकर चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक
गोली बकरीके दूध अथवा कुडेकी छालके क्वाथके साथ सेवन करानी चाहिये ।
फिर भोजनके पहले ग्रासमें उसको दो रत्तीकी मात्रासे दहीके साथ सेवन करावे ।
इस रसको पहिले प्रतिदिन दो दो रत्तीकी मात्रासे लेकर दस रत्तीतक बढावे । फिर
क्रमसे घटाकर चार रत्तीतक करलेवे । इसपर मसूरका यूष, शीतलजल तथा
भातका पथ्य देना चाहिये । यह रस सब प्रकारकी संग्रहणी और विशेषकर कुक्षी
( पेट ) की मृदुताको दूर करता है ॥ ९१–९४ ॥
टङ्गणक्षारगन्धाश्मरसं जातीफलं तथा ।
बिल्वं खदिरसारं च जीरकं श्वेतधूनकम् ॥ ९५ ॥
कपिहस्तकबीजं च तथैव बकपुष्पकम् ।
एषां शाणं समादाय श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ९६ ॥
बिल्वपत्रककार्पासफलं शालिञ्चदुग्धिका ।
शालिञ्चमूलं कुटजत्वचः कञ्चटपत्रकम् ॥ ९७ ॥
सर्वेषां स्वरसेनैव वटिकां कारयेद्भिषक् ।
रक्तिकैकप्रमाणेन खादयेद् दिवसत्रयम् ॥ ९८ ॥
दधिमस्तु ततः पेयं पलमात्रप्रमाणतः ।
अपि योगशताक्रान्तां ग्रहणीमुद्धतां जयेत् ॥ ९९ ॥
आमशूलं ज्वरं कासं श्वासं शोथं प्रवाहिकाम् ।
रक्तस्रावकरं द्रव्यं कार्यं नैवात्र युक्तितः ॥ २०० ॥
ष्णवार्ताकुमत्स्यं च दधि तक्रं च शस्यते ।
ज्ञात्वा वायोः कृतिं तत्र तैलं वारि प्रदापयेत् ॥ २०१ ॥
५-सुहागा, जवाखार, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, जायफल, बेलगिरी, खैरसार,
जीरा, सफेद राल, कौंचके बीज और अगस्तियाके फूल प्रत्येक चार चार माशे
लेकर बारीक चूर्ण करलेवे फिर उस चूर्णको बेलके पत्ते, कपासके फल, शालिञ्च-
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