भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २९० | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी- |
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शाक, दुद्धी, शालिञ्चकी जड, कुडेकी छाल और जलचौलाई इन सब औषधियोंके रसमें खरल करके एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इस औषधिको प्रतिदिन एकएक गोलीके क्रमसे तीन दिनतक सेवन करे और ऊपरसे एकएक पल प्रमाण दहीका तोड पान करे। यह औषधि जो सैकडों प्रयोगोंसे भी दूर नहीं हुई हो ऐसी प्रबल संग्रहणी एवं आमयुक्त शूल, ज्वर, खाँसी, श्वास, शोथ और प्रवाहिका इन सब रोगोंको नष्ट करती है। इसपर रक्तस्राव करनेवाले पदार्थोंको कदापि सेवन नहीं करना चाहिये। काले बैंगन, मछली, दही और मट्ठेको सेवन करना चाहिये। एवं वायुके बलाबलको विचारकर इसपर तेल और जल देना चाहिये॥९५-२०१॥
ग्रहणीवज्रकपाटरस ।
सूतं गन्धं यवक्षारं जयन्त्युग्राभ्रटङ्कणम् ।
जयन्तीभृंगजम्बीरद्रवैः पिष्ट्वा दिनत्रयम् ॥ २०२ ॥
यामार्द्धं गोलकं स्वेद्यं मन्देन पावकेन च ।
शीते जयारससमैः शाल्मलीविजयाद्रवैः ॥ २०३ ॥
भावयेत्सप्तधा वज्रकपाटः स्याद् रसोत्तमः ।
माषद्वयं त्रयं वाऽस्य मधुना ग्रहणीं जयेत् ॥ २०४ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, जवाखार, अरणी, वच, अभ्रक और सुहागा इन सब औषधियोंके चूर्णको अरणी, भाँगरा और जम्बीरीनींबू इनके रसमें पृथक् पृथक् तीन दिनतक खरल करके गोलासा बनालेवे। उस गोलेको मन्दमन्द अग्निके द्वारा आधे प्रहरतक स्वेद देवे। फिर शीतल होजानेपर भाँग, सेमलकी मूसली और हरड इनके रस अथवा क्वाथमें सात बार भावना देवे तो यह ग्रहणीवज्रकपाटरस सिद्ध होता है। इस रसकी दो या तीन माशे मात्रा शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे संग्रहणी दूर होती है ॥ २०२-२०४ ॥
बृहद्ग्रहणीवज्रकपाट ।
तारमौक्तिकहेमानि सारश्चैकैकभागकम् ।
द्विभागो गन्धकः सूतस्त्रिभागो मर्दयेदिमान् ॥५॥
कपित्थस्वरसैर्गाढं मृगशृंगे ततः क्षिपेत् ।
पुटेन्मध्यपुटेनैव तत उद्धृत्य मर्दयेत् ॥ ६ ॥
बलारसैः सप्तधैवमपामार्गरसैस्त्रिधा ।
लोध्रं चातिविषा मुस्ता धातकीन्द्रयवामृताः ॥ ७ ॥