भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २५१
प्रत्येकमेतत्स्वरसैर्भावना स्यात्रिधा त्रिधा । माषमात्रो रसो देयो मधुना मरिचैस्तथा ॥ ८ ॥ हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं सर्वजामपि । कपाटो ग्रहणीरोगे रसोऽयं वह्निदीपनः ॥ ९ ॥
रूपा, मोती, सुवर्ण और लोह इन प्रत्येककी भस्म एक एक भाग, शुद्ध गन्धक दो भाग और शुद्ध पारा तीन भाग ले एकत्रितकर कैथके पत्तोंके स्वरसमें उत्तम प्रकारसे खरल करके हिरनके सींगमें भरकर और उसको अच्छे प्रकारसे बंद करके गजपुटमें रखकर पकावे । पश्चात् औषधिको निकालकर खिरेंटीके रसमें ७ वार एवं चिरचिटा, लोध, अतीस, नागरमोथा, धायके फूल, इन्द्रजौ और गिलोय इन प्रत्येकके रसमें तीन तीन वार भावना देकर एक एक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली शहद और काली मिरचोंके चूर्णके साथ सेवन करनेसे यह रस सर्व प्रकारके अतिसार और सर्वदोषोत्पन्न ग्रहणीरोगको शीघ्र नष्ट करता है ॥ २०६-२०९ ॥
संग्रहग्रहणीकपाट रस ।
मुक्ता सुवर्णं रसगन्धटङ्कं घनं कपर्दामृततुल्यभागः । सर्वैः समं शङ्ककचूर्णमिष्टं खल्ले च भाव्योऽतिविषाद्रवेण २१०॥ गोलं च कृत्वा मृदुकर्पटस्थं सम्पाच्य भाण्डे दिवसार्द्धकं च । सर्वाङ्गशीते रस एष भाव्यो धुस्तूरवह्नीमुसलीद्रवैश्च ॥ लौहस्य पात्रे परिभावितश्च सिद्धो भवेत् संग्रहणीकपाटः॥११॥
मोती, सुवर्ण, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, अभ्रक, कौडी इनकी भस्म और शुद्ध मीठातेलिया इन सबको समान भाग और सबके बराबर शङ्खकी भस्म लेवे, फिर सबको खरलमें डालकर अतीसके क्वाथमें खरल करके गोलासा बनालेवे । उस गोलेको सूक्ष्मवस्त्रमें लपेटकर किसी एक मट्टीके उत्तम पात्रमें यथाविधि बन्द करके गजपुटमें रखकर दो प्रहरतक पकावे । जब स्वांगशीतल होजाय तब औषधिको निकालकर लोहेके पात्रमें डालकर धतूरा, चीता और मुसली इनके रस व क्वाथमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस प्रकार यह संग्रहग्रहणीकपाटरस सिद्ध होता है ॥ २१० ॥ २११ ॥
वातोत्तरायां मरिचाज्ययुक्तः पित्तोत्तरायां मधुपिप्पलीभिः ॥ कफोत्तरायां विजयारसेन कटुत्रयेणाज्ययुतो ग्रहण्याम् ॥१२॥