भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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२९४ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

शुद्धपारा और शुद्धगन्धक दोनोंको चार चार माशे लेकर एक उत्तम पत्थरके खरलमें डालकर अच्छे प्रकारसे मर्दन करके कज्जली बनालेवे । फिर जायफल, मोचरस, नागरमोथा, सुहागा, अतीस, जीरा और मिरच ये प्रत्येक चार चार माशे और शुद्ध मीठातेलिया एक माशे लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर पूर्वोक्त कज्जलीमें मिश्रित करके आम, बाँस, गन्धप्रसारिणी, जलपीपल, सिह्नालू, भाँग, जामुन, अरणी, अनार, कुकुरभाँगरा, पाठ और भाँगरा इन प्रत्येक ओषधिके पत्तोंके स्वरसमें पृथक् २ अच्छे प्रकारसे खरल करके बेर की गुठलीकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ २४-२७ ॥-

-बहुप्रकारं सामं निहन्त्यत्र यथानुपानम् । कुर्याद्विशेषादनलावलम्बं कासं च पञ्चात्मकमम्लपित्तम् २८॥ इयं निहन्ति ग्रहणीं प्रवृद्धां मर्त्यस्य जीर्णग्रहणीमसाध्याम् । चिरोद्भवां संग्रहकोष्ठदुष्टिं शोथं समुग्रं गुदजानसाध्यान् २९॥ आमानुबद्धं त्वतिसारमुग्रं जयेद् भृशं योगशतैर साध्यम् । विवर्जनीयास्त्विह भृष्टमत्स्या मत्स्यस्तथा पाण्डुरवर्ण एव ३० रम्भाफलं मूलमथौदनं च बुधैर्विधेयं न कदाचिदत्र । जातीफलाद्या वटिका विधेया यशोऽर्थिनोवैद्यवरस्य हृद्या । अनेकसंभावितमर्त्यलोकनानाविधव्याधिपयोधि नौका ॥ ३१ ॥

यह वटी यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन करनेसे नानाप्रकारके आमयुक्त विकारोंको नष्ट करतीहै और विशेषकर अग्निको दीपन करती है । एवं पाँचों प्रकारकी खांसी, अम्लपित्त, प्रबल और असाध्य संग्रहणी, बहुत पुरानी कोष्ठकी खराबी, अत्यन्त बढाहुआ शोथ, असाध्य गुदाके रोग, आमयुक्त अत्युग्र अतिसार और जो सैकड़ों प्रयोगोंसे भी सिद्ध न हो सके हों ऐसे असाध्य रोगोंको तत्काल नष्ट करती है । इसको सेवन करनेपर भुनीहुई मछली, पीले रंगकी मछली, केलेकी फली तथा कदलीके कन्द और भात इन पदार्थोंको कदापि भक्षण नहीं करना चाहिये । यह जातीफलाद्य वटिका यश चाहनेवाले वैद्योंके मनको हरनेवाली है और इस मनुष्यलोकमें अनेकप्रकारके रोगरूपी समुद्रमें डूबते हुए मनुष्योंको उबारनेके लिये नौकारूप है ॥ २८-३१ ॥

वडवामुख रस ।

शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्राभ्रटङ्कणम् । सामुद्रं च यवक्षारं स्वर्जिसैन्धवनागरम् ॥ ३२ ॥