भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २९५


अपामार्गस्य च क्षारं पलाशवरुणस्य च ।
प्रत्येकं सूततुल्यं स्यादम्लयोगेन मर्दयेत् ॥
हस्तिशुण्डीद्रवैश्चाग्नौ मर्दयित्वा पुटेल्लघु ॥ ३३ ॥
माषमात्रः प्रदातव्यो रसोऽयं वडवामुखः ।
ग्रहणीं विविधां हन्ति संग्रहग्रहणीं ज्वरम् ॥ ३४ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, ताँबेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, सुहागा, सामुद्रिक लवण, जवाखार, सज्जी, सैन्धानमक, सोंठ, चिरचिटेका खार, ढाकका क्षार और वरनेका क्षार इन सबको समानभाग लेकर काँजीके साथ खरल करे फिर हाथीशुण्डा और चीतेकी जड़के क्वाथमें खरल करके लघुपुटमें पकावे । यह वडवामुखनामक रस एक एक माशे परिमाण सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी संग्रहणी और ज्वरादि रोगोंको शीघ्र दूर करता है ॥ ३२–३४ ॥

ग्रहणीशार्दूलरस ।

रसगन्धकयोश्चापि कर्षमेकं सुशोधितम् ।
द्वयोः कज्जलीकां कृत्वा हाटकं षोडशांशतः ॥ ३५ ॥
लवङ्गं निम्बपत्रं च जातीकोषफले तथा ।
एतेषां कर्षचूर्णेन सूक्ष्मैलां सह मेलयेत् ॥ ३६ ॥
मुक्तागृहे च संस्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् ।
पञ्चगुञ्जाप्रमाणेन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ३७॥

शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धकको एकएक कर्ष प्रमाण लेकर एकत्र खरलकर कज्जली बनालेवे. फिर उसमें सुवर्णभस्म सोलहवां भाग एवं लौंग, नीमके पत्ते, जावित्री, जायफल और छोटी इलायची इनको एकएक कर्ष चूर्ण मिलाकर एक सीपीमें अच्छे प्रकारसे बंद करके और ऊपरसे कपड़ौटीकर पुटपाक करे । पश्चात् स्वांगशीतल होनेपर औषधिको निकालकर प्रतिदिन पांच पांच रत्तीकी मात्रासे भक्षण करे ॥ ३५–३७ ॥

सूतिकां ग्रहणीरोगं हरत्येष सुनिश्चितम् ।
अर्शोघ्नो दीपनश्चैव बलपुष्टिप्रसाधनः ॥ ३८ ॥
कासश्वासातिसारघ्नो बलवीर्यकरः परः ।
संग्रहग्रहणीरोगमामशूलं च नाशयेत् ॥
संसारलोकरक्षार्थं पुरा रुद्रेण भाषितः ॥ ३९ ॥