भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें२९६ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-
यह रस सूतिकारोग,ग्रहणी,अर्श,खांसी श्वास, अतीसार,अत्यंत प्रबल ग्रहणी और आमशूल रोगको निश्चय नष्ट करता है, एवं अग्निको दीपन करनेवाला, बल पुष्टि और वीर्यको अत्यन्त वृद्धि करनेवाला है । इस रसको पूर्वकालमें सांसारिकजीवोंकी रक्षाके लिये महादेवजीने कहा है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥
महागन्धक और सर्वाङ्गसुन्दररस ।
रसगन्धकयोः कर्षं ग्राह्यमेकं सुशोधितम् ।
ततः कज्जलिकां कृत्वा मृदुपाकेन साधयेत् ॥ ४० ॥
जात्याः फलं तथा कोषं लवङ्गारिष्टपत्रके ।
सिन्दुवारदलं चैव एलाबीजं तथैव च ॥ ४१ ॥
एतेषां कर्षमात्रेण तोयेन सह मर्दयेत् ।
मुक्तागृहे पुनः स्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् ॥ ४२ ॥
घनपङ्के बहिर्लिप्त्वा पुटमध्ये निधापयेत् ।
गुञ्जाषट्कप्रमाणेन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ ४३ ॥
शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक दोनोंको एक एक कर्ष लेकर कज्जली बनालेवे फिर उसमें जल मिलाकर लोहेके पात्रमें मन्द मन्द अग्निसे कुछ देरतक पकावे पश्चात् उसमें जायफल, जावित्री, लौंग, नीमके पत्ते, निर्गुण्डीके पत्ते और छोटी इलायची इन प्रत्येकका एक एक कर्ष चूर्णको मिलाकर जलके साथ खरल करे । फिर इस औषधिको एक सीपीमें भरकर और दूसरी सीपीसे बन्दकरके केलोंके पत्तोंसे लपेटकर ऊपरसे गाढ़ी २ कीचडका लेप करके आरने उपलोंकी अग्निमें रखकर पुटपाक करे । जब वह पककर लालवर्ण होजाय तब निकालकर शीतल होनेपर खरल करलेवे । इस रसको प्रतिदिन छः रत्ती प्रमाण यथादोषानुसार उचित अनुपानके साथ सेवन करना चाहिये ॥ २४०-४३ ॥
ज्वरघ्नं दीपनं चैव बलवर्णप्रसादनम् ।
दुर्वारं ग्रहणीरोगं जयत्येव प्रवाहिकाम् ॥ ४४ ॥
सूतिकां च जयेदेतद्रक्तार्शो रक्तसम्भवम् ।
कासश्वासातिसारघ्नं वाजीकरणमुत्तमम् ॥ ४५ ॥
यह रस ज्वर, दुस्साध्य संग्रहणी, प्रवाहिका, सूतिकारोग, रक्तार्श, खाँसी, श्वास, अतिसारआदि रोगोंको शीघ्र दूर करताहै तथा अग्निप्रदीपक, बल, वर्णको प्रसन्न करनेवाला और उत्तम वाजीकरण औषधि है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥