भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९८ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-
पारेको चार माशे परिमाण लेकर कांजी, चीतेके क्वाथ और त्रिफलेके क्वाथमें क्रमसे भावना देकर शुद्ध करे । फिर दो माशे गंधकको भांगरेके रसमें शुद्ध करके एकत्र पारेके साथ खरलकर पश्चात् एक पत्थरके खरलमें निर्गुण्डीके पत्ते, ब्राह्मी, सफेद कोयल, पाठ, ग्रीष्मसुन्दर ( शालिंचशाक ), कुकुरभांगरा, अरणी, भांग और दारचीनी इन प्रत्येकके चार चार मासे रसमें क्रमसे मर्दन करके सरसोंकी बराबर गोलियां बनालेवे । इसको ग्रहणीरोग, आमवात, मंदाग्नि, ज्वर, प्लीहा, उदररोग, वात-कफरोग और कफविकारमें सेवन करावे । संग्रहणीरोगमें इसको एक साथ सात गोली देवे और ऊपरसे दहीकी तोड अथवा तक्रको यथेच्छरूपसे सेवन करावे । इससे संग्रहणीरोग नष्ट होता है ॥ ४९-२५५ ॥
खसर्पणवटी ।
पक्वेष्टकाहरिद्राभ्यामागारधूमकेन च ।
शोधितं पारदं चैव कर्षार्द्धं तुलया धृतम् ॥ ५६ ॥
भृङ्गराजरसैः शुद्धं गन्धकं रससम्मितम् ।
द्वाभ्यां कज्जलिकाम् कृत्वा भावयेत्तत्तु भेषजैः ॥ ५७ ॥
सिन्दुवारदलरसे मण्डूकपर्णिकारसे ।
केशराजरसे चापि ग्रीष्मसुन्दरजे रसे ॥ ५८ ॥
रसेऽपराजितायाश्च सोमराजीरसे तथा ।
रक्तचित्रकपत्त्रोत्थे रसे च परिभावितम् ॥ ५९ ॥
रसमानसमानेन च्छायायां शोषयेद्भिषक् ।
सर्षपाभाश्च गुडिकाः कारयेत्त कुशलो भिषक् ॥ २६० ॥
पक्की ईंटके चूर्ण, हल्दीका चूर्ण और घरका धुआँसा इन तीनोंके द्वारा शुद्ध किया हुआ पारा एक तोला और भाँगरेके रससे शुद्ध किया हुआ गन्धक एक तोला लेवे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर निर्गुण्डीके पत्ते, ब्राह्मी, कुकुरभाँगरा, ग्रीष्मसुन्दर ( शालिंचशाक ), बापची और लालचीतेके पत्ते इन प्रत्येक औषधिके एकएक तोला रसमें पृथक् २ खरल कर सरसोंकी बराबर गोलियाँ बनाकर छायामें सूखालिये ॥ ५६-२६० ॥
ततः सप्त वटीर्दद्याद्दधिमस्तुसमाप्लुताः ।
नित्यं दध्ना च भोक्तव्यं कोष्ठदुष्टिनिवृत्तये ॥ ६१ ॥