भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३०३


चव्यं कटुत्रयफलत्रयकेशराज- दन्तीपयोदचपलाऽनलघण्टकर्णाः ॥ ९४ ॥ माणौल्लुकन्दबृहतीत्रिवृताः ससूर्या- वर्त्ताः पुनर्नविकया सहितास्त्वमीषाम् । मूलं प्रति प्रतिविशोधितमक्षमेकं चूर्णं तदर्द्धरसगन्धकमेकसंस्थम् ॥ ९५ ॥

काला अभ्रक, शुद्ध लोहमल ( मण्डूर ), वायविडङ्ग ये प्रत्येक ४-४ तोले एवं चव्य, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, आमला, बहेडा, कुकुरभाँगरा, दन्तीकी जड, नागरमोथा, पीपल, चीतेकी जड, मोघावृक्ष, मानकन्द, जिमीकन्द, बडी कटेरी, निसोत, हुलहुल और विखपपरा इन प्रत्येकके मूलका शुद्ध चूर्ण दो दो तोले और शुद्ध पारा गन्धककी कज्जली एक तोला लेवे ॥ ९४ ॥ ९५ ॥

कृत्वाऽऽर्द्रकीयरससंवलितं च भूयः संपिष्य तस्य वटिका विधिवद् विधेया । हन्त्यम्लपित्तमरुचिं ग्रहणीमसाध्यां दुर्नामकामलभगन्दरशोथगुल्मान् ॥ ९६ ॥ शूलं च पाकजनितं सतताग्निमान्द्यं सद्यः करोत्युपचितिं चिरनष्टवह्नेः । कुष्ठं निहन्ति पलितं च वलिं प्रवृद्धां श्वासं च कासमपि पाण्डुगदं निहन्ति ॥ ९७ ॥ वायन्नमांसदधिकाञ्जिकतक्रमत्स्य- वृक्षाम्लतैलपरिपक्वभुजो यथेष्टम् । शृङ्गाटबिल्वगुडकञ्चटनारिकेल- दुग्धानि सर्वविदळानि विवर्जयेत्तु ॥ ९८ ॥

फिर सबका एकत्र अदरखके रसमें भावना देकर और उसीमें फिर उत्तम प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह वटी अम्लपित्त, अरुचि, असाध्य संग्रहणी, बवासीर, कामला, भगन्दर, शोथ, गुल्म, शूल, निरन्तर अग्निकी मन्दता, कुष्ठ, पलित ( बिना अवस्थाके ही बालोंका सफेद होजाना ), वलि ( बिनाही अवस्थाके शरीरमें बलियोंका पडजाना ), श्वास, खांसी, पाण्डुरोगप्रभृति रोगोंको शीघ्र