भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३०२ भैषज्यरत्नावली । [ ग्रहणी-

अनुपानं प्रदातव्यं दग्धबिल्वसमं गुडम् । अतिसारं ज्वरं तीव्रं रक्तातीसारमुल्वणम् ॥ ८६ ॥ ग्रहणीं चिरजां हन्ति शोथं दुर्नामकं तथा । आमशूलबिबन्धघ्नः संग्रहग्रहणीहरः ॥ ८७ ॥ पिच्छामदोषं विविधं पिपासादाहरोगकम् । हृल्लासारोचकच्छर्दिगुदभ्रंशं सुदारुणम् ॥ ८८ ॥ पक्वापक्कमतीसारं नानावर्णं सवेदनम् । कृष्णारुणं च पीतं च मांसधावनसन्निभम् ॥ ८९ ॥ प्लीहगुल्मोदरानाहसूतिका रोगसङ्करम् । असृग्दरं निहन्त्येव वन्ध्यानां गर्भदं परम् ॥ ९० ॥ कामलां पाण्डुरोगं च प्रमेहानपि विंशतिम् । एतान् सर्वान् निहन्त्याशु मासाद्धै नात्र संशयः ॥ ९१॥ पीयूषवल्लीवटिका अश्विभ्यां निर्मिता पुरा । कश्यपाय ददौऽश्विभ्यां ततः प्राप प्रजापतिः ॥ ९२ ॥ धन्वन्तरिस्ततः प्राप देवतानां पतिस्ततः । परम्पराप्राप्त एष रसस्त्रैलोक्यदुर्लभः ॥ ९३ ॥

इस रसको समान भाग मिश्रितकर भुनेहुए बेल और गुड़के साथ सेवन करानेसे अतिसार, ज्वर, प्रबल अतिसार, बहुत पुरानी संग्रहणी, सूजन, बवासीर, आमशूल, विबन्धयुक्त संग्रहणी, पिच्छिलता, आमदोष, प्यास, दाह, उबकाई, अरुचि, वमन, दारुण गुदभ्रंश, पक्व अथवा अपक्व तथा विविध प्रकारकी पीड़ायुक्त अतिसार, काला, लाल, पीला और मांसके धोवनकी समान वर्णवाला अतिसार, प्लीहा (तिल्ली), गुल्म, उदररोग, अफारा, सूतिकारोग, रक्तप्रदर, वन्ध्यात्व, कामला, पाण्डु और बीसों प्रमेह इन सब रोगोंको यह रस एक पक्षमें ही निस्सन्देह नष्ट कर देता है तथा गर्भको उत्पन्न करता है। यह पीयूषवल्लीनामक बटी अश्विनीकुमारोंसे प्राप्तहुई थी ॥ ८६-९३ ॥

पानीयभक्तवटी ।

कृष्णाभ्रलोहमलशुद्धविडङ्गचूर्णं
प्रत्येकमेकपालिकं विधिवद् विधाय ।