भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें...रसा । भाषाटीकासहिता । ३०१
वातश्लेष्मणि वाते वा विविधे चेन्द्रियस्थिते ।
वातवृद्धे पित्तवृद्धे बलासानावृतेऽपि च ॥ ७९ ॥
अष्टसूदररोगेषु कुष्ठरोगेषु शस्यते ।
अजीर्णे कर्णरोगे च कृशे स्थूले च यक्ष्मणि ॥ ८० ॥
अयं सर्वगदेष्वेव रसो वै परिकीर्त्तितः ।
महाभ्रवटिका सेयं परा श्रेष्ठा रसायने ॥ ८१ ॥
इन गोलियोंको यथोचितमात्रासे सेवन करनेसे ज्वर, अतीसार, श्वास, खांसी, क्षय, संनिपातज्वरं विविधप्रकारके विषमज्वर, सब प्रकारके क्षयरोग, शुक्रकी क्षीणता, राजयक्ष्मा, पुरानी संग्रहणी, विशेषकर सुतिकारोग, स्थविर, आमवातरोग, मन्दाग्नि, निर्बलता, सर्वप्रकारके कफरोग, पीनस, पक्व अपक्व अपीनसरोग, वातश्लेष्म, अनेक प्रकारके वातरोग, आठ प्रकारके उदररोग, कुष्ठरोग आदि नष्ट होते हैं । यह महाभ्रवटिका अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है ॥ ७५-८१॥
पीयूषवल्लीरसं ।
सूतकं गन्धकं चाभ्रं तारं लौहं सटङ्गणम् ।
रसाञ्जनं माक्षिकं च शाणमेकं पृथक् पृथक् ॥ ८२ ॥
लवङ्गं चन्दनं मुस्तं पाठा जीरकधान्यकम् ।
समङ्गाऽतिविषा लोध्रं कुटजेन्द्रयवं त्वचम् ॥ ८३ ॥
जातीफलं विश्वबिल्वं कनकं दाडिमीच्छदम् ।
समङ्गा धातकी कुष्ठं प्रत्येकं रससम्मितम् ॥ ८४ ॥
भावयेत् सर्वमेकत्र केशराजरसैः पुनः ।
चणकाभा वटी कार्या छागीदुग्धेन पेषिता ॥ ८५ ॥
शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धककी कज्जली ८ माशे एवं अभ्रक, रौप्यभस्म, लोहभस्म सुहागा, रसौंत, सोनामाखी, लौंग, लालचन्दन, नागरमोथा, पाठ, जीरा, धनियाँ, लज्जावंती, अतीस, लोध, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, दालचीनी, जायफल, सोंठ, बेलगिरी, धतूरेके बीज, अनारका वक्कल, वराहक्रान्ता, धायके फूल और कूठ प्रत्येक चार चार माशे लेवे । सबको एकत्र पीसकरके कुकुरभाँगरेके रसकी बारम्बार भावना देवे । फिर बकरीके दूधमें खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे ॥ ८२-८५ ॥