भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३०८ | भैषज्यरत्नावली, | [ ग्रहणी-


सैन्धवं बालकं मुस्तं धान्याकं गन्धकं रसम् ।
शृङ्गी कर्पूरकं चैव प्रत्येकं माषकोन्मितम् ॥ ३० ॥
माषद्वयं रामठं स्यान्मरिचानां चतुष्टयम् ।
जातीकोषं लवङ्गं च पत्रं च तोलकोन्मितम् ॥ ३१ ॥
नाभिशङ्खं विडङ्गं च शाणं माषद्वयं विषम् ।
कर्षषट्कं सत्रिमाषं सूक्ष्मैलानां ततः क्षिपेत् ॥ ३२ ॥
विडं कर्षद्वयं सर्वं छागीक्षीरेण पेषयेत् ।
चतुर्गुञ्जामितां खादेत् सानाहग्रहणीं जयेत् ॥ ३३ ॥
शम्भुना निर्मितो ह्येष पूर्ववद् गुणकारकः ।
नाम्ना महाराजपूर्वो नृपवल्लभ उच्यते ॥ ३४ ॥

सोनामाखी, लोहेकी भस्म, अभ्रककी भस्म, वङ्गकी भस्म, चाँदीकी भस्म, सुवर्णकी भस्म, पीपलामूल, अजवायन, दालचीनी, ताँबेकी भस्म, सोंठ, सुहागा, सेंधानमक, सुगन्धवाला, नागरमोथा, धनियां, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, काकड़ासिंगी और कपूर ये प्रत्येक एक एक मासा, हींग दो मासे, कालीमिरचोंका चूर्ण चार मासे, जावित्री, लौंग और तेजपात प्रत्येक एक एक तोला, शंखनाभिकी भस्म और वायविडङ्ग प्रत्येक चार चार मासे शुद्ध मीठा तेलिया दो मासे, छोटी इलायचीका चूर्ण ८ मासे और बिरियासंचरनमक २ कर्ष लेवे । सबको एकत्र चूर्ण करके बकरीके दूधमें खरल करे । फिर चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करे । इसके सेवनसे आनाहयुक्त संग्रहणी नष्ट होती है और यह पूर्वोक्त प्रयोगकी समान गुण करता है । इसको शिवजीने निर्माण किया है । यह रस महाराजनृपवल्लभ नामसे प्रसिद्ध है ॥ २९-३३४ ॥

अथ रसपर्पटी ।

श्रीविन्ध्यवासिपादान् नत्वा धन्वन्तरिं च सुरभिषजम् ।
रसगन्धकपर्पटिकापरिपाटीपाटवं वक्ष्ये ॥ १ ॥

अत्र पारदस्य नैसर्गिकदोषत्रयशोधनं चावश्यं कार्यम् ।
यदुक्तम्—
“मलशिखिविषनामानो रसस्य नैसर्गिका दोषाः ।
मूर्च्छां मलेन कुरुते शिखिना दाहं विषेण हिक्कां च ॥

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