भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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१६भैषज्यरत्नावली ।[ ग्रहणी-

एवमादींस्तथा रोगान् गराणि विविधानि च ।
हन्त्यनेन प्रयोगेण वपुष्मान् निर्मलः सुधीः ॥ ४७ ॥
जीवेद् वर्षशतं पूर्णं वलीपलितवर्जितः ।
भोजनं रक्तशालीनां त्यक्त्वा शाकं विदाहि च ॥ ४८ ॥
आमवातप्रकोपं च चिन्तनं मैथुनं तथा ॥ ४९ ॥
प्रातरुत्थाय संसेव्या विधिनाऽऽयुःप्रवर्द्धिनी ॥ ५० ॥

इसको प्रतिदिन एक एक रत्तीसे बढ़ाकर सात दिन, चौदह दिन अथवा जब आरोग्य लाभ न हो तबतक सेवन करावे तो यह लौहपर्पटी प्रसूतिरोग, ज्वर-ग्रहणी, आमशूल, अतिसार, पाण्डुरोग, कामला, प्लीहा (तिल्ली), मन्दाग्नि, भस्मकरोग, आमवात, उदावर्त्त, १८ प्रकारक कुष्ठ, एवं अन्यान्य रोगों और विविध-प्रकारके विषोंको अवश्य दूर करता है । इस प्रयोगके सेवनसे मनुष्य निर्मल शरीरवाला और विद्वान् होता है । एवं वली और पलित रोगसे मुक्त होकर पूर्ण सौ वर्षतक जीता है । इसपर लाल शालिधानोंके चावलोंका भात खाना चाहिये तथा शाक, दाहकारक पदार्थ, आमवातको कुपित करनेवाले पदार्थ, चिन्ता और मैथुन ये सब त्याग देने चाहिये । प्रातःकाल उठकर इसको विधिपूर्वक सेवन करनेसे आयुकी वृद्धि होती है ॥ ४४-५० ॥

स्वर्णपर्पटी ।

रसोत्तमं पलं शुद्धं हेम तोलकसंयुतम् ।
शिलायां मर्दयेत्तावद्यावदेकत्वमागतम् ॥ ५१ ॥
गन्धकस्य पलं चैकमयस्पात्रे ततो दृढे ।
मर्दयेद्दृढपाणिभ्यां यावत् कज्जलतां व्रजेत् ॥ ५२ ॥
ततः पाकविधानज्ञः पर्पटीं कारयेत् सुधीः ।
रक्तिकादिक्रमेणैव योजयेदनुपानतः ॥ ५३ ॥
ग्रहणीं विविधां हन्ति यक्ष्माणं च विशेषतः ।
शूलमष्टविधं हन्ति वृष्या सर्वरुजापहा ॥ ५४ ॥

सिंगरफसे निकालाहुआ शुद्ध पारा ४ तोले और सोनेकी भस्म १ तोला दोनोंको एकत्र मिलाकर पत्थरके खरलमें उत्तम प्रकारसे मर्दन करे जब दोनों मिलकर एकरूप होजाय तब उसमें गन्धक १ पल डालकर लोहेके पात्रमें अच्छे प्रकारसे खरल करे । जब घोटते २ कज्जलीकी समान होजाय तब पूर्वोक्त रस-