भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३१५
इसमें कहीहुई विधिके अनुसारही विविध रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये और औषधिकी क्रियाके अनुसार ही इसपर उत्तर क्रिया करनी चाहिये । विघ्नोंको हरनेके लिये प्रथम क्षेत्रपालको बलि देवे पश्चात् योगिनियोंको उक्तमन्त्रसे बलि देवे । फिर माङ्गलिक कार्य करके प्रातःसमय इसका सेवन करे ॥ ३८ ॥ ३९ ॥
लौहपर्पटी ।
समौ गन्धरसौ कृत्वा कज्जलीकृत्य यत्नतः ।
शुद्धलौहस्य चूर्णं तु रसतुल्यं प्रदापयेत् ॥ ४० ॥
एकीकृत्य ततो यत्नात् लौहपात्रे प्रमर्दितम् ।
घृतप्रलिप्तदर्व्यां तु स्वेदयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ४१ ॥
द्रवीभूतं समाहृत्य ढालयेत् कदलीदले ।
चूर्णीकृत्य सुखार्थाय पथ्यभुग्भिः प्रसेव्यते ॥ ४२ ॥
शीतोदकानुपानं वा क्वाथं वा धान्यजीरयोः ।
लौहेन पर्पटी ह्येषा भक्ष्या लोकस्य सिद्धिदा ॥ ४३ ॥
शोधित पारे और शोधित गन्धकको समान भाग लेकर यथाविधि कज्जली करलेवे । फिर उसमें पारेकी बराबर शुद्ध लोहेकी भस्म मिलाकर लोहेके बर्तनमें खरल करे पश्चात् लोहेकी करछीमें घी लगाकर उसमें कज्जलीको रखकर मन्द-मन्द अग्निसे पकावे । जब कज्जली पिघलकर पतली होजाय तब नीचे उतारकर पूर्वोक्त रसपर्पटीकी समान गोबरपर रक्खेहुए केलेके पत्तेपर डालकर दूसरे केलेके पत्तेसे ढककर ऊपरसे कपडेकी पोटलीसे धीरे २ दाबदेवे । फिर उसको सुखाकर चूर्ण करके शीशीमें भरकर रखदेवे । यह पर्पटी पथ्यसेवनवालेको देनी चाहिये और ऊपरसे शीतल जल अथवा जीरे और धनियेका क्वाथ पान करना चाहिये । इसके सेवनसे मनुष्यको यथेष्ट फलकी सिद्धि होती है ४०-४३ ॥
रक्तिकैकां समारभ्य वर्द्धयेद्रक्तिकां क्रमात् ।
सप्ताहं वा द्वयं वापि यावदारोग्यदर्शनम् ॥ ४४ ॥
सूतिकां च ज्वरं चैव ग्रहणीमतिदुस्तराम् ।
आमशूलातिसारांश्च पाण्डुरोगं सकामलम् ॥ ४५ ॥
प्लीहानमग्निमान्द्यं च भस्मकं च तथैव च ।
आमवातमुदावर्तं कुष्ठान्यष्टादशैव तु ॥ ४६ ॥