भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी-
यह पर्पटी—बवासीर, आमसहित संग्रहणी, शूल, अतिसार, कामला, पाण्डुरोग, अतिकठिन प्लीहा (तिल्ली), गुल्म, जलोदर, भस्मकरोग, आमवात, १८ प्रकारके कुष्ठ, सम्पूर्ण शोथ आदि रोग और अम्लपित्तको तत्काल नष्ट करती है । एव त्रिदोषको दमन करनेवाली, अत्यन्त भूखको बढानेवाली, जठराग्निको तत्काल प्रज्वलित करती है । यह पारे और गन्धककी पर्पटी समस्त व्याधिसमूहको नष्ट करती है तथा वलिका (असमयमें शरीरमें वलीका पडना), पलित (असमय बालोंका पकना) रोगको दूर करती है और मनुष्यको दीर्घायु बनाती है ॥ ३१–३४ ॥
व्याधिप्रभावहरणादपमृत्युत्रासनाशकरणाच्च ।
मर्त्यानाममृतवटी रसगन्धकपर्पटी जयति ॥ ३५ ॥
शम्भुं प्रणम्य भक्त्या पूजां कृत्वा च विष्णुचरणाब्जे ।
रसगन्धकपपंटिका भक्ष्या तेनातिसिद्धिदा भवति ॥ ३६ ॥
नृणां सरुजां ध्रुवमियमरोग्यं सततशीलिता कुरुते ।
श्रीवत्साङ्कविर्निर्मितसम्यग्रसपर्पटी श्रेष्ठा ॥ ३७ ॥
व्याधिके प्रभावको हरने और अकालमृत्युके भयको नाश करनेके कारण यह पर्पटी मनुष्योंको अमृतवटीकी समान हितकारी है । भक्तिसहित शिवजीको प्रणाम कर और विष्णुके चरणकमलोंका पूजन करके इस पर्पटीको भक्षण करनेसे यह विशेष सिद्धिके देनेवाली है । यह पर्पटी निरन्तर उत्तम प्रकारसे मनुष्योंके आरोग्य करनेके लिये सर्वोत्तम औषधि है ॥ ३५–३७ ॥
उक्तमेव हि कर्त्तव्यं नानारोगतया तथा ।
औषधक्रिययैवात्र कर्त्तव्या चोत्तरक्रिया ॥ ३८ ॥
प्रत्यवायविनाशार्थं क्षेत्रपालबलिं न्यसेत् ।
कृतमंगलकः प्रातर्योगिनीनामतः परम् ॥ ३९ ॥
[ भक्षणात्पूर्वं बलिदानमन्त्रः—“ॐक्षँक्षेँ क्षेत्रपालाय नमः ।”
क्षेत्रपालस्य सामान्यबलिदानमन्त्रः—“ॐ ह्रीँ ह्रेँ दिव्याभ्यो योगिनीभ्यो मातृभ्यः क्षेत्रीभ्यो भूतेभ्यः शालिकीभ्यो नमो नमो ह्रीँ” इति सामान्ययोगिनीनां बलिः। “ॐ गन्धकमहाकालाय स्वाहा । ॐ ब्रह्मकोषिणि रक्ष रक्ष स्वाहा ।” इति विशेषबलिः ॥ ]