भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३१३


होनेसे ज्वर और विरेचन हो तो समानभाग जल मिलाकर अथवा अधिक जल-मिश्रित दूधको पकाकर पीना चाहिये । वमन होनेपर नारियलका जल अथवा दूध पान करना चाहिये । यदि स्वप्नम वायपात हो जाय तो दुग्धपान करना चाहिये ॥ २४-२६ ॥

न जायते बुभुक्षा लक्ष्यालक्ष्या प्रतीयते यदि वा ।
अशक्तिझिनिझिनिमस्तककूलाद्यैर्नूनमवधार्या ॥ २७ ॥
किं बहु वाच्यं रोगी यदा यदा भवति साकांक्षः ।
पाययितव्यं दुग्धं तदा तदा निर्भयी भूयः ॥ २८ ॥

भूँख उत्पन्न हुई है या नहीं इसकी परीक्षा इस प्रकार करनी चाहिये—जब शरीर शक्तिहीन हो, मस्तकमें शूल और झनझनाहट आदि लक्षण मालूम हों तब निश्चय भूख लगा समझना चाहिये । बहुत कहनेसे क्या है, रोगीको जब जब भूँख लग तबही तब निर्भय होकर बारबार दूध पिलावे ॥ २७ ॥ २८ ॥

विहिताकरणे चास्यामविहितकरणे च रोगखिन्नानाम् ।
व्यापत्तयोऽपि बहुधा दृष्टाः प्रामाणिकैर्बहुशः ॥ २९ ॥
तस्मादवधातव्यं भवितव्य भोजने निपुणैः ।
एवमियं क्रियमाणा भवति श्रेयस्करी नियतम् ॥ ३० ॥

इसमें कहे हुए नियमोंका पालन न करनेसे और निषिद्ध नियमोंको करनेसे रोगीको नानाप्रकारकी व्याधियाँ उत्पन्न होजाती हैं । ऐसा बडे २ प्रामाणिक मनुष्योंने अनेक बार देखकर कहा है, इसलिये भोजनादिमें कुशल वैद्योंको यथाविधि नियमोका पालन करना चाहिये । इस प्रकार सेवन की हुई यह पर्पटी अवश्य महत् उपकार करती है ॥ २९ ॥ ३० ॥

अर्शोरोगं ग्रहणीं सामं शूलातिसारौ च ।
कामलपाण्डुव्याधिं प्लीहानं चातिदारुणं हन्ति ॥ ३१ ॥
गुल्मजलोदरभस्मकरोगं हन्त्यामवातांश्च ।
अष्टादशैव कुष्ठान्यशेषशोथादिरोगांश्च ॥ ३२ ॥
इयमम्लपित्तशमनी त्रिदोषदमनी क्षुधातिसन्दीेपनी ।
अग्निं निमग्नमुदरे ज्वालाजटिलं करोत्याशु ॥ ३३ ॥
रसगन्धकपर्पटिका त्वपवार्य व्याधिसंघातम् ।
वलिकापलितविशून्यं पुरुषं दीर्घायुषं कुरुते ॥ ३४ ॥