भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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थोडे घी, जीरे, धनिये और अन्यान्य मसालोंके द्वारा सिद्ध किये हुए सेंधानमक मिले हुए व्यञ्नादि, पुराने शालिचावलोंका भात, काले बैंगन, पाठके पत्तोंका शाक, बथुआ, साबुत मूँग, केलेके पत्ते, परवल, सुपारी, अद्रख, मकोयके पत्तोंका शाक, लवा, बत्तक, तीतर, मोर, इनका मांस, मद्गुर, रोहित और काली मछली, समानभाग मिश्रित जलके साथ सिद्ध किया हुआ दूध ये सब पदार्थ हितकारी हैं ॥ १७-२० ॥
रम्भाफलदलवल्कलमूलानां वर्जनं कार्यम् ।
तिक्तं निम्बादिकमपि नाद्यं नोष्णं तथाऽम्लं च ॥ २१ ॥
आनूपमांसजलचरपतत्रिपलं च सर्वथा त्याज्यम् ।
स्त्रीणां सम्भाषणमपि गडकश्च कृष्णमत्स्येषु ॥ २२ ॥
नाम्लं नो दधि शाकं पर्पट्या भक्षणे भक्ष्यम् ।
गुडखण्डशर्करादिकमिक्षुविकारो न भक्ष्य इक्षुश्च ॥
न दलं न फलं न लताप्यदनीया कारवेल्लस्य ॥ २३ ॥
एवं पकेहुए केलेके फल बक्कल और जड, नीमको आदि लेकर सम्पूर्ण कडुवे पदार्थ, गरम अनूपदेशके जीवोंका मांस तथा जलमें रहनेवाले जन्तुओंका मांस, पक्षियोंका मांस, मछली, कालीमछलियोंमें गडक नामवाली मछली, खट्टे पदार्थ, दही और शाक आदि पदार्थ कदापि नहीं भक्षण करने चाहिये और इस पर्पटीका सेवन करते हुए स्त्रियोंसे बात चीततक भी नहीं करनी चाहिये । तथा गुड, खाँड, शर्करा, ईंखके रसके बनेहुए पदार्थ और ईख (गन्ने) करेलेके पत्ते, फल और बेल आदि भी कभी नहीं खाने चाहिये ॥ २१-२३ ॥
स्तोकं घृतमिह भक्ष्यं पथ्ये साकांक्षमुत्थानम् ।
क्षुत्पीडायां भोजनमवश्यकार्यं महानिशायां च ॥ २४ ॥
समजलमिश्रं पक्वं क्षीरं यद्वाऽधिकजलपक्वं च ।
कथमपि भोजनसमयातिक्रमजाते ज्वरे विरेके च ॥ २५ ॥
वमने च नारिकेलं सलिलं दुग्धं च पातव्यम् ।
स्वप्ने जाते रमिते विरेकतः क्षीरमेव पातव्यम् ॥ २६ ॥
इसपर घृत थोडा खाना चाहिये और पथ्यमें यथेच्छ आहार देना चाहिये । भूख लगनेपर अवश्य भोजन करे । यदि आधीरातके समय भूख लगे तब उस समय भी भोजन करना चाहिये । यदि कदाचित् भोजनके समयका उल्लंघन