भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३२४ | भैषज्यरत्नावली । | [ ग्रहणी- |
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षट्शीतेऽष्टदिनान्यतः परमिदं विस्राव्य संचूर्णये-
च्चातुर्जातपलेन संहतमिदं शुक्लं च चुक्रं च तत् ॥ ९८ ॥
हन्द्याद्वातकफामदोषजनितान्नानाविधानामयान्
दुर्नामानि च शूलगुल्मजठरान् हत्वाऽनलं दीपयेत् ॥ ९९ ॥
चावलोँका जल एक प्रस्थ, तुषोदकँ (काँजीका भेद) ३ प्रस्थ, खट्टा दही ३२ तोले, अम्लमूलक (बासीकाँजीमें पकाई हुई मूलीके टुकड़े) ८ पल, गुड़ दो शराव, शुद्ध किये हुए अदरखके टुकडे ३२ तोले, एवं सैंधानमक, जीरा पीपल, मिरच और हल्दी ये प्रत्येक आठ आठ तोले लेवे। इन सबको एकत्र मिलाकर मजबूत और चिकने मिट्टीके बर्त्तनमें भरकर उसके मुँहको अच्छे प्रकार बन्द करके धान अथवा जौके ढेरमें गाड़देवे। इसको गरमीके दिनोंमें तीन दिन, शरऋतुमें चार दिन, वर्षाकालमें अथवा वसंतऋतुमें ६ दिन और शीतकालमें ८ दिनतक गड़ा रखना चाहिये। फिर उसको निकालकर उसमें दालचीनी, तेजपात, इलायची और नागकेशर इन प्रत्येकका चूर्ण चार चार तोले मिला देवे। इस प्रकार यह बृहद् शुक्त अथवा बृहच्चुक्र सिद्ध होता है। यह चुक्र सेवन करतेही वात, कफ और आमदोषसे उत्पन्न हुए विविधप्रकारके रोग एवं अर्श, ग्रहणी, शूल, गुल्म और उदररोग इन सबको नष्ट करके अग्निको दीपन करता है ॥ ९७-९९ ॥
आयामकाञ्जिक ।
वाट्यस्य दद्याद्यवसक्तुकानां पृथक्पृथक्चाढकसम्मितं तु ।
मध्यप्रमाणानि च मूलकानि दद्याच्चतुः षष्टिसुकल्पितानि ॥
द्रोणेऽम्भसः प्लाव्य घटे सुधौते दद्यादिदं भेषजजातयुक्तम् ।
क्षारद्वयं तुम्बुरुबस्तगन्धा धनीयकं स्याद् विडसैन्धवं च ॥
सौवर्चलं हिङ्गु शिवाटिकां च चव्यं च दद्याद् द्विपलप्रमाणम् ।
इमानि चान्यानि पलोन्मितानि विजर्जलीकृत्य घटे क्षिपेच्च ॥
कृष्णामजाजीमुपकुञ्चिकां च तथाऽऽसुरीं कारविचित्रकं च ।
पक्षस्थितोऽयं वलवर्णदेहवयस्करोऽतीव बलप्रदश्च ॥ १०३ ॥
वाट्य (भूसीरहित जौको १४ गुने जलमें पकानेसे जो मांड प्रस्तुत होता है) एक आढक, जौके सत्तू १ आढक एवं मध्यम दर्जेकी (न बहुत