भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362
३३०भैषज्यरत्नावली ।[ग्रहणी-

एवं नानाप्रकारकी ग्रहणी, अतिसार, अरुचि, संग्रहणी और अर्शादि समस्त उपद्रवोंको शीघ्र नष्ट करता है। जो स्त्रियाँ रजोदोषसे और जो पुरुष वीर्यदोषसे युक्त हैं, वेभी इसका सेवन करनेसे नवयौवनयुक्त, अत्यन्त वीर्यवान् और बलवान् होते हैं, बन्ध्या स्त्री भी शूरवीर और विद्वान् पुत्रको प्राप्त करती है। इस विल्व तैलको आत्रेयमुनिने निर्माण किया है ॥ २५-३० ॥

ग्रहणीमिहिरतैल ।

धन्याकं धातकी लोध्रं समङ्गाऽतिविषा शिवा ।
उशीरं वारिवाहं च जलं मोचं रसाञ्जनम् ॥ ३१ ॥
बिल्वं नीलोत्पलं पत्रं केशरं पद्मकेशरम् ।
गुडूचीन्द्रयवश्यामा पद्मकं कटुरोहिणी ॥ ३२ ॥
तगरं नलदं भृङ्गं केशराजः पुनर्नवा ।
आम्रजम्बुकदम्बानां त्वचः कुटजवल्कलम् ॥ ३३ ॥
यमानी जीरकं चैषां काषाक्षाणि प्रकल्पयेत् ।
तैलप्रस्थं पचेत् सम्यक् तक्रेणान्यतमेन वा ॥ ३४ ॥
कुटजत्वक्कषायेण धान्यककथितेन वा ।
बुद्ध्वा दोषगतिं तत्त तथान्यौषधवारिणा ॥ ३५ ॥

धनियाँ, धायके फूल, लोध, लज्जावन्ती, अतीस, हरड, खस, नागरमोथा, सुगन्धवाला, मोचरस, रसौंत, बेलगिरी, नीलकमल, तेजपात, नागकेशर, कमल, केशर, गिलोय, इन्द्रजौ, अनन्तमूल, पद्माख, कुटकी, तगर, बालछड, दालचीनी, कुकुरभाँगरा, पुनर्नवा, आमकी छाल, जामुनकी छाल, कदमकी छाल, कुडेकी छाल, अजवायन और जीरा इन प्रत्येक औषधिका कल्क एक एक कर्ष एवं तिलका तैल एक प्रस्थ, मट्ठा एक प्रस्थ, कुडेकी छालका क्वाथ एक प्रस्थ और धनियेका क्वाथ एक प्रस्थ एवं जल एक द्रोण परिमाण लेवे। सबको एकत्रकर विधिपूर्वक तैलको सिद्ध करे। इस तैलको दोषोंके बलाबलका विचारकर अन्यान्य औषधियोंके साथ मिश्रितकरके सेवन करावे ॥ ३१-३५ ॥

एतद्रसायनवरं वलीपलितनाशनम् ।
हन्ति सर्वानतीसारान् ग्रहणीं सर्वरूपिणीम् ॥ ३६ ॥
ज्वरं तृष्णां तथा कासं हिक्कां श्वासं वमिं भ्रमिम् ।
सोपद्रवां कोष्ठरुजं नाशयेत् सत्यमेव हि ॥ ३७ ॥